Friday, 14 April 2017

दलित नवचेतना की आवाज अम्बेडकर

     आज 14 अप्रैल है | आम्बेडकर साहब का जन्मदिन | वो पुष्प जो जमीन पर उगा और फकत आसमान पर खिला | जिसने लाख कठिनाइयाँ झेली पग पग पर अपमान झेला पर अपना विश्वास नहीं खोया | अपनी मंजिल जिसने खुद तय की | मुश्किलों के पहाड़ो का सीना चीर कर जिसने अपना रास्ता बनाया | राह के कांटे जिसके सिर का ताज बने | जी हाँ आज उस आम्बेडकर का जन्मदिन है | जो मुंह में चांदी की चम्मच लेकर पैदा हुआ राजपुत्र नहीं था | जो अर्जुन नहीं था पर अपनी मेहनत, अपनी लगन, और अपनी साधना से वो एकलव्य बना | किन्तु वही आम्बेडकर आज आपके सम्मान का मोहताज है | ये बहुत ग्लानि की बात है सोशल मीडिया के नेटवीर आज के दिन उस महापुरुष को कोस रहे हैं जिसकी पगधूलि का वो एक अंश मात्र भी नहीं हैं |

     आम्बेडकर साहब को कोसना बहुत आसन है | उन्हें आप आरक्षण के नाम पर कोसिये या उनके धर्म परिवर्तन करने पर | पर आम्बेडकर बनना उतना ही दुष्कर है | कल्पना मात्र कीजिये कि आपको सिर्फ इसीलिए नहीं पढने दिया जाता क्योंकि आप दलित हैं | मारे प्यास के आपका गला सूख रहा है | सामने तालाब है और आप इसीलिए पानी नहीं ले सकते क्योंकि आप अछूत हैं | आप पानी छू भर लेंगे तो शायद गंगाजली भी उसे शुद्ध न कर पाए | आपके छाया भर पड़ने से ब्राह्मण तो छोडिये बनिए तक अशुद्ध हो जाये | जिस उम्र में स्नेह और आशीर्वाद मिलना चाहिए उस उम्र में आपको गालियाँ मिले | पग पग पर पल पल पर जातिसूचक शब्दों से आपका ह्रदय बींध दिया जाए | 
     सोचिये आम्बेडकर किन किन परिस्थियों से गुजरे | क्या हश्र होता होगा उस नन्हें बालक का ? सोचिये जरा ? पर उन विषम हालात में भी उन्होंने आशा न छोड़ी | अपने पूर्वजों की तरह उन्होंने हथियार नहीं डाले | वो लडे अपने अधिकारों के लिए | वो उन करोडो लोगो की आवाज़ बने जो उठने से पहले कुचल दी जाती थी |
     किसी भी देश का इतिहास उसकी सबसे बड़ी धरोहर होती है | कहते हैं कि इतिहास वो आइना होता है जिसमे भूत को निरख कर वर्तमान संवारा जाता है ताकि सुखद भविष्य की आधारशिला रखी जा सके | लेकिन अपना भारत दुनिया का इकलौता ऐसा मुल्क है जिसमे इतिहास सिर्फ किताबों तक सीमित है | यहाँ इतिहास सिर्फ पढ़ा जाता है कभी गुना नहीं जाता | कभी इससे सीख नहीं ली जाती है | क्योंकि अगर हमने इतिहास में झाँका होता तो आज दलितों को उनका सम्मान कब का मिल चुका होता | 
     आज भी दलितों के प्रति हमारी दुर्भावना जस की तस है | आप उप्र, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश और बिहार में छपने वाला कोई भी अखवार उठा लीजिये उसमे एक खबर जरूर होगी | “दबंगों ने नहीं चढने दी दलित की बारात |”
     आज भी पांडे जी का दलित दोस्त अगर गलती से उनके घर आ जाये तो उनकी बुआ कहती हैं | “ ह रे चमरवा ! तोहरी हिम्मत कईसे हुई गईल हमरी द्वारी पे आपन गोड रख्खे क |” कभी दलित बस्तियों में बिजली की सप्लाई रोक दी जाती है | कभी पानी के पाइप काट दिए जाते हैं | क्यों भाई क्यों नहीं चढ़ा सकता दलित अपनी बारात ? क्यों नहीं आ सकता पांडे जी का दलित दोस्त उनके घर पर ? ये लोग इन्सान नहीं है क्या ? क्या ये किसी दूसरी दुनिया से आये हुए लोग है ? क्या ये मानसिकता बदलनी नहीं चाहिए ? क्यों भाई कब सीख लोगे अपने इतिहास से जब खुद इतिहास हो जाओगे तब ?
     शिकायत मुझे आम नागरिको से नहीं हैं | शिकायत है मुझे उन तथाकथित धर्म ध्वजा रक्षको से जो आज भी दलितों को उनका हक़ देने के लिए तैयार नहीं है | जो हिन्दुत्व के पुरोधा हैं जो आद्य शंकराचार्य की परम्परा से हैं | वो कैसे किसी दलित से घृणा कर सकते हैं ? 
     हमारे यहाँ तो महर्षि वाल्मीकि को भगवान् का दर्जा दिया गया है | स्वयं मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम शबरी के जूठे बेर खाते हैं और उन्हें अपनी माँ कहते हैं | उन्हीं भगवन श्रीराम का एक परम मित्र भील समुदाय से होता है | फिर उन भगवान् श्रीराम के वंशज दलितों का तिरस्कार भला कैसे कर सकते हैं ? विश्व को वसुधैव कुटुम्बकम का पाठ पढाने वाली उदारमना हिन्दू संस्कृति क्या इतनी निष्ठुर हो सकती है जो अपने ही एक अंग को अपृश्य घोषित कर दे ? 
     आम्बेडकर साहब ने भी तो बस इसी के खिलाफ आवाज उठाई थी | उन्होंने समानता का अधिकार ही तो माँगा था | हमारे पूजनीय धर्मगुरु क्या उन्हें सम्मान से जीने का हक़ भी नहीं दे सकते ? अगर ये संभव नहीं तो मुझे ये कहने में कोई झिझक नहीं है कि मेरे मन में आम्बेडकर साहब का स्थान किसी भी शंकराचार्य की गद्दी से ऊँचा है |
     कल्पना मात्र कीजिये कि क्या हाल हुआ होता आपके हिंदुत्व का यदि आम्बेडकर साहब ने मुस्लिम या ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया होता वो तो शुक्र मनाइए वीर सावरकर और प.पू. गुरूजी का जिनके परामर्श से उन्होंने बौद्ध बनना स्वीकार किया और हिंदुत्व को शर्मशार होने से बचा लिया |
     इसीलिए हे सुबह शाम अनर्गल प्रलाप करने वाले हिन्दू महारथियों कृपया वीर सावरकर और प.पू. डॉ. साहब के अथाह परिश्रम पर पानी मत फेरो | इससे अच्छा है कि अपनी 10% उर्जा दलित उत्थान पर खर्च कर दो | अगर आप अपना थोडा समय भी दलित बस्तियों में बिता दोगे तो शायद आप हिंदुत्व का ज्यादा भला कर पाओगे | तभी शायद उनके सपनों के भारत के निर्माण में अपना योगदान दे पाओगे |
     बाबा साहब माफ़ करना ! हमें शायद अभी तक हम उस समाज का निर्माण नहीं कर सके हैं जिसकी कल्पना आपने दशको पहले की थी | एक जातिमुक्त समाज जिसमे कोई छोटा या बड़ा न हो | जिसमे कोई अपृश्य न हो, अछूत न हो | जिसमे सभी को सामान अधिकार और सम्मान मिले | आज हम आपके 127 वीं जन्मजयंती पर ये संकल्प लेते हैं कि अपने प्रिय भारतवर्ष को जाति मुक्त देश बनायेंगे | भेदभाव मिटायेंगे | आपके अनथक परिश्रम को सफल करेंगे | आपकी जन्मजयन्ती पर आपको शत बार नमन |

Thursday, 6 April 2017

एक ख़त फली नरीमन के नाम

आदरणीय फली नरीमन जी,

    इतिहास में जितनी प्राचीन पुरानी मानव सभ्यताओं का जिक्र है उसमें मेसोपोटामिया का नाम प्रमुख है । इतिहास कहता है कि ये सभ्यता बहुत प्रगतिशील और विकसित थी । तक़रीबन 5 हजार साल पुरानी सभ्यता .. सैकड़ो साल का धारा प्रवाह उन्नत जीवन .. वृहद् नगर .. बड़े बड़े भवन विशाल जनसँख्या । तत्कालीन भारत से व्यापार होता था इनका मसालों और घोड़ों का । आपत्तिकाल से बचने के लिए इनके पास असंख्य मुद्रा भंडार था ।
        
     किन्तु इसी महान मेसोपोटामिया सभ्यता के वंशज 2014 में सिंजर क्षेत्र की पहाड़ियों में शरण लेने को मजबूर हुए थे । इन्हीं की बहन बेटियां आइसिस के जवानों के बिस्तर पर हूरों की तरह सजती थीं । इनकी लड़कियों को इंजेक्शन दिए जाते हैं ताकि वो समय से पहले जवान हो जाएँ और आइसिस के आतंकियो की हवस मिटा सकें । 

     बेचारी रोज कंट्रासेप्टिक पिल्स या उस जैसी ही कोई दवा खातीं हैं ताकि माँ न बन सकें । अव्वल तो वो प्रेग्नेंट होती नहीं अगर हो भी जाएँ तो ये लड़कियां अपने बच्चों को उसके बाप का नाम नहीं बता सकती । भला सैकड़ो की भीड़ में कैसे पहचानेगी वो । वो तो पड़ी रहती हैं बेचारी बिस्तर पर .. बेसुध । एक के बाद एक भेड़िये आते हैं । अपनी हवस मिटाते हैं उसकी बोटी नोचते हैं और चले जाते हैं ।
                       
     पर मुझे ये सब सुन कर दया नहीं आती । गुस्सा भी नहीं आता । ये इनके पूर्वजों के कर्मों(कु) का फल है जो ये भोग रहे हैं । सदियों पहले इन्हीं लोगों ने पूर्वजों ने इन आइसिस वालों के पूर्वजों को शरण दी थी । ये जड़ें थीं सेकुलरिज्म की जिसे इनके पूर्वजों ने सिंचित किया और उन्हें पाला पोसा । बिना कुछ सोचे समझे उन्होंने न केवल उन्हें शरण दी बल्कि उनसे आर्थिक और धार्मिक सम्बन्ध तक स्थापित कर लिए |

     शनै-शनै कालचक्र बदला । सूर्य ने पूर्व से पश्चिम की यात्रा पूर्ण की । तब के याचक अब शासक हो गए । संख्याबल से सत्ता परिवर्तित हुई । राजदंड अब आइसिस वालों के हाथ में आ गया । इन्होंने वो गलती नहीं की जो मेसोपोटेमियन्स ने की । इन्हें अपना लक्ष्य पता था । इसीलिए इन्होंने यजीदियों को सिंजर क्षेत्र की पहाड़ियों में में खदेड़ दिया । उनके पुरुषों को संडास साफ़ कराने के लिए गुलाम बना लिया । उनकी स्त्रियों को अपने जिस्म की प्यास बुझाने के लिए अपने हरम में बाँध लिया । 

     आज सुना किसी फली नरीमन ने योगी आदित्यनाथ की आलोचना उनके हिन्दू महंत होने को लेकर की है । इन महोदय के समुदाय का इतिहास भी इसी कहानी से मिलता जुलता है । माननीय को सेकुलरिज्म के उसी कीड़ें ने काटा है जिसने सदियों पहले मेसोपोटेमियन्स को डस कर उनकी बुद्धि भ्रष्ट की थी । ये भी उसी कर्क रोग से पीड़ित हैं जिसका कोई इलाज नहीं, कोई कीमोथैरेपी नहीं | जो जानलेवा है और ये उसे एक बार भोग कर बर्बाद भी हो चुके हैं |
        
     एक समय था जब पारसी समुदाय दुनिया भर से प्रताड़ित होकर भारत में शरण लेने आया । उस समय विश्व बंधुत्व के रंग में रंगे हुए वो हिंदुस्थानी ही थे जिन्होंने गुजरात के तटों पर इन पारसियों का स्वागत किया | रहने को छत नहीं, खाने को रोटी नहीं थी इनके पास | वो वसुधैव कुटुम्बकम के प्रेम में पगे हुए हिंदुस्थानी ही थे जिन्होंने इन्हें वहां रचाया बसाया | जहाँ इनके रहने, खाने का बंदोबस्त किया | हाँ वो एकं सत विप्रा बहुधा वदन्ति मानने वाले हम थे जिन्होंने आपका धर्म परिवर्तन नहीं कराया | जिन्होंने आपके बच्चो गुलाम नहीं बनाया | जिन्होंने आपकी स्त्रियों को अपने हरम में नहीं सुलाया |

     महोदय आपको छत दी हमने | आपके बच्चों को रोटी दी हमने | आपकी स्त्रियों को सम्मान दिया हमने | और जानते हैं क्यों किया हमने ये सब ? क्युकि हमारी हिन्दू संस्कृति ही हमें इसकी प्रेरणा देती है | हिन्दू संस्कृति का प्रतीक भगवा का अर्थ ही त्याग है | जो स्वयं के लिए जिया वो क्या जिया | मनुष्य वो है जो मनुष्य के लिए मरे | “ईशावास्यं इदं सर्वं” ये है हिंदुत्व के मायने | ये है हिन्दू संस्कृति के प्रतीक भगवा की प्रेरणा | और आप आज पवित्र भगवा की ही आलोचना कर रहे हैं ?

     तकरीबन दो हजार साल पहले यहूदी शरणार्थियों ने भारत में शरण ली | इनका इतिहास तो सर्वविदित है | पुरे विश्व में इनके नरसंहार के नित नए अध्याय लिखे गए | वो केवल हिन्दुस्थान था जहाँ इन्हें इनके मुश्किल वक्त में शरण मिली | सन 1948 में इजरायल आज़ाद हुआ | उनकी संसद में एक अध्यादेश पारित हुआ | “धन्यवाद हिन्दुस्थान ! तुम अकेले देश हो जहाँ हमें शरण मिली | जहाँ हमारा नरसंहार नहीं हुआ ...” |

     ‘द हिन्दू’ 27 अप्रैल 2013 के अंक में एक लेख छपा ‘अ होम अवे फ्रॉम होम’ जिसमे ‘Dropped From Heaven’ की लेखिका सोफी का जिक्र है | वो कहती हैं “हिन्दुस्थान में मेरे तीन मित्र थे वो सब एक दुसरे के बिना नहीं रह सकते |” सोफी के पिता कहते हैं “We are Indian first and Jews later.सोफी के पति साइमन कहते हैं कि “India was never anti-Semitic. 
                          
     एक अन्य यहूदी धार्मिक गुरु लिखते हैं “Jews have lived in India for over 2,000 years and have never been discriminated against. This is something unparalleled in human history.

     सुना नरीमन महोदय आपने ? इसे कहते हैं कृतज्ञता | जो शायद आपमें नहीं है | ये केवल 4 5 लोगों के बयान मात्र नहीं हैं | इस पर अगर लिखने बैठा जाए तो सैकड़ो लोग अपनी यादे ताज़ा कर सकते हैं | वो सभी बतायेंगे कि कैसे दुनिया भर के लोग उनके खून के प्यासे थे तब केवल और केवल हिन्दुस्थान में उन्हें सुरक्षा और सम्मान मिला | और ये सब सम्भब हुआ इसी भगवा के कारण, जिसकी आपने आलोचना की है |

     शक, हूण, कुषाण, मुग़ल यहाँ तक कि गुलाम वंश के लोगों ने हम पर आक्रमण किया | गजनी गौरी जैसे लुटेरे आये जिन्होंने मंदिर ढहाए और सोना लूट के ले गए | किन्तु हमने कभी पलट कर बदले की भावना से उनके देशों पर आक्रमण नहीं किया | हमारे यहाँ से भी विवेकानंद और बुद्ध आदि लोग बाहर गए किन्तु तलवार लेकर नहीं बल्कि ज्ञान लेकर |
     अपने अनादि काल के अज्ञात और लगभग 10 हजार सालों के ज्ञात इतिहास में कभी हिन्दुस्थानियों ने किसी देश पर आक्रमण नहीं किया | हम दुनिया के हर देश में गए जरूर | हमने देश जीते जरूर पर प्रेम से | हथियारों से नहीं | हमने दुनियां को विश्व शांति का पाठ पढाया | ऐसे समय जब ग्रीक हमलावर सिकंदर विश्व विजेता बनने के सपने देख रहा था | वो हम थे जो दुनिया भर में मसाले बेच सबके खानों में जायका भर रहे थे |

     सहिष्णुता के इस गौरवशाली इतिहास के बाबजूद जब कोई हिन्दुओं की आलोचना करता है तब वास्तव में दुःख होता है | सोचता हूँ क्या हमें भी इतिहास से सबक ले बर्बर और असभ्य हो जाना चाहिए ? पर जब अपने भव्य अतीत में झांकता हूँ तब चमत्कृत हो उठता हूँ | भगवा के शौर्य और त्याग की गाथाएं सुन हृदय गर्व से भर उठता है |

     कभी कभी सोचता हूँ कि फली नरीमन जैसों के कहे पर क्यों अपना समय और प्रयास व्यर्थ करूँ | क्युकि तब मुझे सोफी की याद आती है | मुझे लगता है सोफी और उस जैसे हजारों बेसहारों की मदद करके मैंने अपनी विश्व बंधुत्व के सिद्धान्तों को सहेज लिया है | और जब जब उन्हें मदद की जरूरत होगी मैं उन्हें अपनी बाँहों भर लूँगा | मैं हमेशा इनके लिए हमेशा सामर्थ्य अनुसार खड़ा रहूँगा | क्युकि यही मेरी हिन्दू संस्कृति है | यही मेरी सभ्यता है | यही मेरा जीवन सन्देश है | यही मेरा भगवा है |

-अनुज अग्रवाल 

Wednesday, 1 March 2017

अकेले हाइवे से पेट नहीं भरता मुख्यमंत्री जी

     ये शायद 2013 या 14 की बात है | मैं कासगंज से दिल्ली जा रहा था | बराबर की सीट पर एक भाई आकर बैठा | बस आगे बढ़ी कुछ समय बीता | घर से जब चला था तब लाईट नहीं आ रही थी | फोन लगभग डाउन था | समय काटे नहीं कट रहा था | एसी परिस्थिति में अज्ञात भाई से बातें करना शुरू कर दी | बातों में बताया वो दिल्ली जा रहा था | इधर यूपी में काम नहीं है | कहीं जुगाड़ लग भी जाए तो गुंडई चरम पर है | ठेकेदार लोग कम पैसे देते हैं | इसीलिए दिल्ली काम करता हूँ | इस तरह की तमाम बातें उससे होती रहीं |
  
     बस कंडक्टर आया मैंने दिल्ली की टिकेट ली पर उसने अलीगढ की ली | ये मेरे लिए आश्चर्य की बात थी | मैंने तुरंत टोक दिया भाई आप तो दिल्ली जा रहे हो | तो अलीगढ की टिकेट क्यों ले रहे हो | उसने जो जबाब दिया वो मेरे लिए थोडा सा सरप्रायजिंग और ज्यादा दुखदायी था | उसने कहा "भाई मजूर आदमी हैं हम | बस में टिकट बहुत मंहगा है | अलीगढ से ट्रेन से चले जायेंगे | कम पैसों में काम हो जायेगा |"

     कासगंज एटा से जो लोग मेहनत मजूरी करने दिल्ली जाते हैं वो पहले बस से अलीगढ जाते हैं | फिर पेसेंजर या एक्सप्रेस जो भी ट्रेन पहले मिले उससे दिल्ली तक का रास्ता तय करते हैं | एक आदमी सामान की भारी भरकम पोटली/बोरी सर पर रख के भरी दोपहरी में 1 से 2 किलोमीटर पैदल चलकर रेलवे स्टेशन जायेगा | भीड़ होने के बाबजूद लाइन में लगकर टिकट लेगा | फिर आधा एक घंटा ट्रेन का इंतज़ार करेगा | २ मिनट ट्रेन रुकेगी उसमे भागकर भीड़ में जगह बना अपना सामान सेट करेगा और खुद भी खड़ा होगा | और ये सब जद्दोजेहाद किसलिए ? मात्र 30 35 या बहुत से बहुत 50 रुपये बचाने के लिए | वो तो प्रभु की दया से अब ट्रेन की हालात सुधर गए हैं | पहले क्या हालत होती होगी इन गरीबों की आप खुद सोच सकते हैं |
                                      
     ऐसे उत्तर प्रदेश जिसके नागरिक चंद पैसो की खातिर ट्रेन में इतना सब कुछ सहते हैं उस प्रदेश के पूर्ण बहुमत वाले मुख्यमंत्री जी कहते हैं कि मोदी जी अगर एक बार आगरा लखनऊ हाइवे पर चल लें तो सपा को वोट दे देंगे | मुख्यमंत्री जी उनका वोट तो आप ले लेंगे | पर उस जनता का वोट कैसे लेंगे जो कष्ट सहकर 20 30 रुपये बचाती है | क्युकि आपके हाई वे पर चलने के लिए इससे ज्यादा तो टैक्स लगता है |

     उत्तर प्रदेश आज पानी, बिजली, रोजगार, स्वच्छता और सुरक्षा व्यवस्था की समस्या से जूझ रहा है | शर्म आती है जब हम अपने प्रदेश में शौचालयों की स्तिथि पर बाकी प्रदेशों के नागरिकों से जली कटी सुनते हैं | अक्सर न्यूज़ पेपर में हम पढ़ते हैं कि फलां बहादुर लड़की ने बारात लौटा दी क्युकि लड़के के घर में शौचालय नहीं है | ये दूल्हे क्या आपके हाईवे के किनारे जाएँ हगने के लिए ? खाने के लिए अन्न नहीं है | आपका हाईवे हाइवे खा लें सर ? रहने के लिए छत नहीं है | आपके हाईवे ओड़ के सो जाएँ सर ? पहनने के लिए कपडे नहीं हैं | आपका हाई वे पहन लें सर ?
         
     आप हाई वे के नाम पर यूपी के किसानों से वोट मांग रहे हैं | ये किसानों के किस काम का है सर ? आप उन्हें बताएं कि क्या आपने उन्हें कालाबाजारी रोक कर उनकी फसल का उचित मूल्य दिलाने का काम किया ? क्या आपने अनाज मंडी में उन्हें अधिकारीयों से बचाया ? क्या आपके राज्य में आपने नहर बम्बों आदि में पानी की उचित व्यवस्था की | ताकि किसान अपनी फसल में सही समय पर पानी लगा सके ? पर ये सब आप नहीं गिना सकते | क्यों क्युकि पांच साल तो आपने सैफई महोत्सव में कटरीना के ठुमको पर कमर लचकाई है | ये सब करने का तो आपको टाइम ही नहीं मिला होगा सर | ऊपर से जब जब आपदा आई तब तब आपने किसानों को भरपाई के नाम पर 59 रुपये के चेक दिए थे | अब यूपी का किसान किस विधि आपको वोट दे ? बताइए जरा ?

     आप व्यापारियों से हाई वे के नाम पर वोट मांग रहे हैं | उधर व्यापारी बेचारा अपहृत हुआ पड़ा है किसी नदी की खादर में | क्युकि आपके राज्य में सुरक्षा व्यवस्था इतनी माशा अल्ला है कि पूछिये मत | हर दिन के अखवारों में छपता है फलां व्यापारी से इतने लाख की लूट | फलां व्यापारी की गोली मार कर हत्या | बनिए बेचारे सोच रहे हैं ये किस को चुन लिया भाई ? माल से तो गए ही गए, जान से भी जा रहे हैं | ऐसे में आपको व्यापारी हाई वे के नाम पर कैसे वोट दे दे मुख्यमंत्री जी ? बेहतर हो आप हमसे हमारी सुरक्षा के वादे करें | इस तरह हाइवे ज्ञान पर तो वैश्य समाज आपको चुनने वाला नहीं है |

     मैं यह नहीं कहता कि मैं हाई वे के खिलाफ हूँ | हाई वे नहीं बनना चाहिए | बिलकुल बनना चाहिए | विकास के लिए, व्यापार के लिए, आदमी की सुविधा के लिए अच्छे हाई वे की सख्त जरूरत है | पर सरकार हाइवे के आलावा और भी बहुत कुछ है जो एक मुख्यमंत्री को करना चाहिए | गाँव में भी तो सड़कें बननी चाहिए न सर | नगर से नगर आपने जोड़ दिए | साधुवाद आपको | पर गाँव से नगर को भी तो जोडिये न सर | वहां भी उन्नति को रास्ता दिखाइए मुख्यमंत्री जी | वहां कौन सड़के बनवायेगा ? क्या आपको गाँव वालों के वोट नहीं चाहिए ? अच्छा आप बताइए कासगंज के लोग आपको आगरा लखनऊ हाइवे के नाम पर वोट क्यों दें ? आपका हाई वे कासगंज के किस काम का ?
         
     इससे पहले आप आदरणीय पूर्व मुख्यमंत्री जी से भूतपूर्व मुख्यमंत्री हो जाएँ मैं ससम्मान आपसे कहना चाहूँगा कि हमें पानी, बिजली, छत, रोजगार, व्यापार, शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा उपलब्ध भी कराइए सर | अकेले हाई वे से हमारा पेट नहीं भरता, इससे हमारी प्यास नहीं बुझती साहब | आशा करता हूँ आप अब हमसे बाकी के मुद्दों पर अपना काम गिनाकर वोट मागेंगे | चुनावो की शुभकामनाओं सहित

-अनुज अग्रवाल 

Friday, 24 February 2017

शिव आदियोगी हैं, नशेडी नहीं

     हाल ही में महाशिवरात्रि का पर्व बीत गया | यानि कि भगवान आशुतोष का दिन | कई मित्रो के मेसेज आये शिवरात्रि की शुभकामनाये प्रेषित करते हुए | सभी का धन्यवाद सभी को शुभकामनाये | रूद्र आप सबकी रक्षा करे | पर आज मन उस तरह प्रफुल्लित नहीं है जिस तरह एक त्यौहार पर होना चाहिए | कारण है कि जितने भी मेसेज आये उनमे से आधे में भगवान् शिव का वर्णन एक नशेडी की तरह किया गया |

     वो महासूर्य अपने धनुष पिनाक की प्रत्यंचा मात्र चढ़ा दे तो अचल पृथ्वी भी कम्पन करने लगती है | उस पराक्रमी का चित्रण आप भांग नशे में चूर रहने वाले आदमी की तरह कर रहे हैं ? जो समस्त लोकों में संहार के देव हैं | जो युद्ध में स्वयं रूद्र और कालों में स्वयं महाकाल हैं | जो सत्य हैं, सनातन है जो शाश्वत हैं, शिव हैं | उन्हें आप धतूरा खाने वाला बता रहे हो ? कभी कुछ लिखने से पहले सोच भी लिया करो मित्रो कि क्या लिख रहे हो और किसके बारे में लिख रहे हो?
     मुझे पता है यहाँ पर भी कुछ मित्र कई धर्मग्रंथो से ससंदर्भ ये प्रमाणित कर सकते हैं कि भगवान् शिव धतूरे या भांग का सेवन करते थे | पर मेरी नजर में ये संभव नहीं है | जो हिंदी को या किसी भी भाषा को थोडा सा भी जानते हैं या जिन्हें साहित्य की थोड़ी सी भी जानकारी है, वो सब ये जानते हैं कि लिखते समय लेखक भाषा को बोझिल होने से बचाने के लिए अलंकारों का प्रयोग करता है | ताकि उसके लिखे की पठनीयता बनी रहे | जैसे किसी कवि ने लिखा
राम रण मध्य एसो कौतुक करत आज |

बाणन के संग छूटन लाग्ये प्रान दनुजन के ||

     “यानि भगवान् श्री राम आज एसा कमाल का युद्ध कर रहे हैं कि जैसे ही वो इधर से बाण छोड़ते है तो दूसरी तरफ राक्षसों का वध हो जाता है | “ अब अगर आप थोडा सा भी सोचेंगे तो पाएंगे एसा करना बिलकुल भी संभव नहीं है | आसानी से कोई भी ये जान सकता है कि ये अतिशयोक्ति का प्रयोग है श्रीराम की वीरता का वर्णन करने के लिए |
                             
     ठीक उसी तरह हम सभी जानते हैं कि शिव महायोगी हैं | कहते हैं कि समाधिस्थ शिव का इस चराचर जगत से कोई सम्बन्ध नहीं रह जाता है | वो समाधि में कुछ इस तरह लीन हो जाते है कि उन्हें खुद के शरीर की भी सुध नहीं रहती है | ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार किसी धतूरा खाए व्यक्ति की हालत हो जाती है | 
     हो सकता है कि उस ज़माने के लेखकों(ऋषि मुनि जो शिक्षा जिन पर शिक्षा के प्रसार का दारोमदार था) ने अपने लेखन में उसी अतिश्योक्ति या रूपक या उत्प्रेक्षा या किसी अन्य अलंकार का प्रयोग अपने शिष्यों को शिव की एकाग्रता को समझाने के लिए किया हो | जरा सी देर के लिए अपने मस्तिष्क के सातों द्वार खोलिए और खुले मन से सोचिये| खुद से पूछिये कि क्या ये संभव नहीं है? क्या पता आपको इसका जबाब खुद आपके अंतर्मन से मिल जाये| 

Thursday, 23 February 2017

एक जंग बौद्धिक आतंकियों के खिलाफ

     अभी हाल ही में रामजस कॉलेज में AISA के बौद्धिक आतंकवादियों द्वारा देश में फिर से अराजकता उत्पन्न करने का कुत्सित प्रयास किया गया | एक सेमिनार थी जिसमे देश द्रोह के आरोपियों को बोलना था | विषय था "कल्चर ऑफ़ प्रोटेस्ट - अ सेमिनार एक्सप्लोरिंग रेप्रजेंटेशन ऑफ़ डिसेंट" |
                               
     विरोध की संस्कृति कैसी होनी चाहिए इस पर वो लोग बोलना चाहते थे जिन्होंने मेरे भारतवर्ष के विरोध में इसके टुकड़े-टुकड़े करने की कसमे खायीं | भारत के अभिन्न अंग कश्मीर को भारत से आज़ाद करने के हिंसक आन्दोलन के समर्थक स्टेज पर बोलेंगे कि हमें विरोध कैसे करना चाहिए ? आयरनी ये है कि जो लोग खूनी माओवाद के धुर समर्थक हैं, जिनका संगठन JNU तक में बैन है, जिनके आकाओं के कहा कि "सत्ता बन्दूक की नालियों से गुजरती है " "वो कामरेड हो ही नहीं सकता जिसके हाथ खून से न रंगे हों |" ऐसे नरपिशाच लोग DU के छात्रो को सिखायेंगे कि विरोध कैसे करना चाहिए ?
     कहते हैं बच्चे अनगढ़ मिट्टी और शिक्षक कुम्हार होता है | कुम्हार अपनी चाक पर मिट्टी को घुमा घुमा कर घड़ा बना सकता है | पर वही मिट्टी जो एक सुन्दर सुराही बन सकती थी जरा सी असावधानी होने कूड़े के ढेर का हिस्सा हो जाती है | यहाँ इस संस्थानों में ऐसे प्रोफेसर्स बहुतायत में हैं जो deliberately स्टूडेंट्स का ब्रेन वाश कर उन्हें कूड़े के ढेर का हिस्सा बना रहे हैं | JNU में किस तरह आतंकवादियों से सॉफ्ट कॉर्नर रखने वाले स्टूडेंट्स और प्रोफेसर्स हैं ये हम सभी जानते हैं | भारत की श्रमजीवी जनता के मेहनत के पैसे पर पलने वाले ये पैरासाइट्स भारत के खिलाफ, भारत के बेटों में ही जहर भरते हैं |
         
     अब तक इनका दायरा सीमित था | ये सब देश की चुनिन्दा यूनिवर्सिटीज में होता था | जैसे JNU AMU आदि आदि | वहां से जम्मू और जाधवपुर यूनिवर्सिटी पहुंचे | अब इनका निशाना राष्ट्रवादियों का गढ़ दिल्ली यूनिवर्सिटी है | अब ये विषाणु हर जगह पांव पसारने की कोशिश कर रहे हैं | फिर इनके समर्थन में इनका नेक्सस आ जाता है | हाँ वही दलाल पत्रकार और वोट्स के भूखे नेता | ये वो वर्ग है जिसे इस देश के प्रति कभी श्रद्धा नहीं रही है | आप गौर से देख लीजिये | इनके समर्थन में वो सब लोग होंगे जो कश्मीर में आतंकवादियो के समर्थक हैं | जिनकी नजर में सेना बलात्कारी है | जिनकी नजर में नक्सल आतंकी मासूम हैं | जो NGO के खेल में सक्रिय हैं | जिनके लिए हिन्दुस्थान अब रहने लायक नहीं बचा है | और सबसे महत्वपूर्ण जिनकी नजर में औरंगजेब मसीहा है |
     जब ऐसे लोगों का विरोध होता है | तब यही लोग पहले उकसाने वाले नारे लगाते हैं | थूकते हैं गालियाँ देते हैं | ढोल की थाप पर कोरस गातें हैं नीम का पत्ता कडवा है और फलां आदमी @#वा है | पलट के कोई बोल दें अबे तुम साले अपने देश को गरियाते हो | तुम तो सोनागाछी के कोठों की पैदाइश हो | फिर ये लोग हमला बोल देते हैं | मारपीट करते हैं | पलट के कोई इनके गाल गरम कर दे तो ये लोग विक्टिम कार्ड खेलना शुरू कर देते हैं | ये ऐसे दर्शातें हैं जैसे इस देश में ये अति शोषित लोग हैं | इनका काम सरल करते हैं मीडिया में बैठे इनके दलाल | जिनकी रिपोर्टिंग और शब्द ऐसे होते हैं जो देश की जनता में इनके लिए सहानुभूति उत्पन्न करते हैं |
     मैं हमेशा से कहता हूँ | वैचारिक लड़ाई में आपका पक्ष आपके शब्द रखते हैं | आप तटस्थ होकर भी तटस्थ नहीं होते | वो आपके शब्द होते हैं जो आपको तटस्थ रखते हुए आपके अन्दर के पक्ष को उजागर करते हैं | इसे समझने के लिए एक उदाहरण लेते हैं :- आप कभी भी देख लीजिये | पत्रकार विशेष हमेशा किसी भी विवाद की स्तिथि में रिपोर्टिंग करते समय AISA के स्टूडेंट्स और ABVP के कार्यकर्त्ता या सदस्य बोलेंगे | वो कभी ABVP के छात्र शब्द का प्रयोग नहीं करेंगे | जैसे कि AISA जैसे संगठनो के लिए ये करते हैं | कुछ पत्रकार जिनके घरवाले ‘लड़कियों की दलाली’ में संलग्न हैं और जो ‘क्रन्तिकारी चैनल’ से हैं वो तो ABVP के गुंडे शब्द का प्रयोग तक कर देते हैं |
                                      
     ऐसे लोग हमेशा वामपंथी संगठनों की मारपीट या देशद्रोह को बढ़ी चालाकी से छिपाते हैं | उदाहरण के लिए आपमें से कितने लोग जानते हैं कि दंतेवाडा में 76 जवानो की नृशंस हत्या पर JNU के आतंकियों ने जश्न मनाया था ? कितने लोग जानते हैं कि JNU में महिषासुर के नाम पर माँ दुर्गा का अपमान किया गया था ? आपमें से कितने लोग जानते हैं कि 29 अप्रैल 2000 को JNU में 2 आर्मी ऑफिसर्स को मर्सीलेस्ली पीटा गया था क्युकि उन्होंने वहां मुशायरे में एंटी इंडिया स्लोगन्स का विरोध किया | अब आप खुद से पूछिए कि क्या ये न्यूज़ आपको टीवी काली करने वालों ने या देश को इंटोलरेंट बताने वालों ने प्राइम टाइम पर दिखाई थी क्या ? पूछिये इनसे कि तब इनके कैमरे कहाँ थे ? यही लोग हैं जो एक पक्ष के प्रोपेगेंडा को प्रमोट करते हैं | बिना पक्ष लिए अपना पक्ष रखना इसी को कहते हैं | और इस नेक्सस का सच सामने लाना बहुत जरूरी है |
     आइये उन सभी को जबाब दें जो भरपूर दें जो हमारे देश के खिलाफ हैं | जिनका सपना भारत की बर्बादी है | आइये जंग छेड़े उन बौद्धिक आतंकवादियों के खिलाफ जो हमारे देश के टुकड़े टुकड़े करना चाहते हैं | अब समय है हम पलट कर जबाब दें | कोई आपको ABVP का गुंडा कहे आप जबाब में AISA का आतंकवादी कहें | वो दिन गए जब आप लोगों की प्रोपेगेंडा पॉलिटिक्स हम चुपचाप सह लेते थे | अब भारत की तरुणाई जाग चुकी है | ये अब तक सहा है अब नहीं सहेंगे | इस गुंडागर्दी का हम हर संभव विरोध करेंगे | आज भगवान आशुतोष का दिन है | आइये इस महाशिवरात्रि पर इस विषवेल के समूल विनाश की शपथ लें | लगायें हर हर महादेव का नारा और संहार कर दें भारत माँ आंचल को तार – तार करने का सपना देखने वालों का |
जय हिन्द जय भारत
हर हर महादेव

Tuesday, 21 February 2017

एक खत रवीश जी के नाम

प्रिय रविश जी,

     आपको तब से सुन रहा हूँ जब शायद स्नातक में रहा होऊंगा | हिंदी पत्रकारिता करने की चाह रखने वाला शायद ही एसा कोई व्यक्ति हो जिसने आपको सुना हो | या आप जिसके आदर्श हों | सीधी सपाट गाँव की सुगंध से भीगी आपकी अल्हड़ भाषा मानो सीधे दिल में उतरती थी | ग्राउंड रिपोर्टिंग में तो आपका जबाब ही नहीं था | आप उस न्यूज़ के उस पहलू को दिखाते थे जिसे शायद कोई सोच भी सके | पर धीरे धीरे आपके व्यव्हार में परिवर्तन आता गया | आपका दोहरा चेहरा उजागर होने लगा | एक आतंकी आपको मासूम लगने लगी | "भारत तेरे टुकड़े होंगे " का उद्घोष करने वालों के लिए आपने स्क्रीन तक काली कर दी | उस दिन मेरा सर शर्म से झुक गया | किसे अपना आदर्श मान बैठा था मैं ? किसके जैसे बनने की चाह ह्रदय में संजोये था मैं ? मैं उस पत्रकार रवीश का प्रशंसक था जिसने दिल्ली कि बदनाम गलियों में अपना प्राइम टाइम कर वैश्यायों का दर्द हम सबके सामने रखा था उसका नहीं जिसने देशद्रोही नारों के समर्थन में स्क्रीन काली कर दी |
     एक बात सोचने की है | क्या "भारत की बर्बादी" के बाद आप भी अपना प्राइम टाइम कर पाएंगे सर ? जिन लोगों का समर्थन आप कर रहे हैं उन्हीं के भाई बन्धु इराक में महिलाओं को नंगा करके कोडियों में बेचते हैं | आशा करता हूँ कि आप इन तथ्यों से अनभिज्ञ तो नहीं होंगे | सोचिये आप इराक में हैं और आपका सुप्रसिद्ध दिल्ली वाला प्राइम टाइम करना चाहते हैं | क्या कर सकेंगे आप ? फिर ऐसे नारों का अंध समर्थन क्यों ? क्या अच्छा नहीं होता कि बजाय स्क्रीन काली करने के आपने कहा होता कि नारें लगे हैं तो इसका दोषी कौन है ? काश आपने मेरे देश को गाली देने वालों के विरोध में अपनी स्क्रीन काली की होती |

     खैर छोडिये इसे | स्क्रीन काली करना आपकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता थी | आपके पक्षपात का विरोध करना हमारी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है | ये जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हाई वे है सर | इसे बाईडायरेक्शनल रहने दीजिये | इसे यूनीडायरेक्शनल मत बनाइये | आपको अधिकार है आलोचना का | आपका अधिकार हमारे सर माथे पर | आलोचना खूब कीजिये आप खूब निंदा कीजिये पर साथ में दूसरों को समीक्षा का अधिकार भी दीजिये | हमें हमारे समीक्षा के अधिकार से वंचित कीजिये सर | पत्रकार रवीश से जज रवीश मत बनिए सर |

     मुझे याद है आपका गौ हत्या पर प्रतिबन्ध के समय का आपका प्राइम टाइम | बजाय ये बताने के कि गौ माँ के दूध से बुद्धि का विकास होता है आप उसके मांस खाने के फायदे बता रहे थे |आप अपने दर्शकों को बता रहे थे कि गौ मांस में इतना प्रोटीन होता है उतना जिंक होता है | जो स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है | शर्म नहीं आती आपको ? कल को कोई सिरफिरा व्यक्ति अगर सर्दी में कुरान जलाने की बात करने लगे तब क्या करेंगे आप ? आप उस सिरफिरे व्यक्ति को रोकने का प्रयास करेंगे या इसे उसका सर्दी से बचने का नैसर्गिक अधिकार बताकर उस सिरफिरे की इस घिनौनी हरकत का विरोध करेंगे ? क्या तब भी आप ये बताएँगे कि एक पन्ने को जलाने से इतने जूल गर्मी या इतने वाट ऊष्मा उत्पन्न होगी ? नहीं | फिर हिन्दुओं के लिए पूज्य गौ के लिए आपका दुराग्रह क्यों ? आपकी कथित धर्मनिरपेक्षता की बलिवेदी पर सिर्फ गौ की ही क़ुरबानी क्यों सर ?
                                   
     अख़लाक़ की मृत्यु पर चूड़ी तोड़ विधवा प्रलाप करने वाले आप लोग प्रशांत पुजारी की नृशंस हत्या पर कभी नहीं बोलते | वो चाहे केरल का सुजीत हो या आगरा का अरुण माहौर | उनकी रूह किसी शमशान में आज तक आपके प्राइम टाइम शो की राह तक रही है | और ये समझना कि ये सिर्फ दो-तीन नाम हैं | ऐसे अनगिनत नाम हैं जो मार दिए गए | कई तो ऐसे हैं जिनकी लाशें तक उनके परिवारीजनो को नसीब हुईं | नयी सड़क पर चलने वाली आपकी NDTV की OP वैन उनकी लाशों को कुचलती हुई कभी JNU गयी तो कभी बिहार | पहुंची तो इन अभागों के द्वार जिनका रास्ता शायद आपको कभी मिला नहीं | या सच कहूँ तो आपने कभी ढूँढने की कोशिश भी नहीं की | अफ़सोस कभी आपको घडी का समय मिला | काश इन मजलूमों को भी आपके वो १५ मिनट नसीब हुए होते | काश कभी इनके लिए भी आपने प्राइम टाइम किया होता |

     आज भी जब आपके भ्राता श्री का नाम सेक्स स्केंडल में उछला है आपने चुप्पी साध ली है | एक कार्यक्रम में किसी ने आपसे तल्ख़ प्रश्न कर दिया था | तब आप सांसे उखाड़ के चिल्ला चिल्ला के पूछ रहे थे कि “जो 25 हेलीकाप्टर लेकर उड़ता है वो दलाल है या नहीं” ? अब आप पूछिये अपने बड़े भैया से कि वो लड़कियों सप्लायर हैं या नहीं | पूछिये न सर राडिया टेप में आने वाली अपनी सहकर्मी से कि नीम का पत्ता कडवा है या नहीं ? आप सभी को दलाल कहिये, अंधभक्त कहिये, चमचा कहिये या गुंडा कहिये पर अगर सामने वाला आपको खबरंडी बोल दे तो टसुये मत बहाइये सर | ये विक्टिम कार्ड मत खेलिए सर | ये फाउल है |
                             
     सुना है सर आप बड़े क्रिएटिव हैं | आपको TRP की परवाह भी नहीं | तो क्यों न आज आप अपने भैया के खिलाफ अपनी क्रियेटिविटी दिखाएँ | चलिए रवीश जी आज वापस उन गलियों में चलें जहाँ आपने अपना सुप्रसिद्ध प्राइम टाइम किया था | उन बदनाम बस्तियों की गाथा दुबारा सुनाएँ जनता को | किस तरह भारत की तरुणाई सिसक रही है अपनी बेबसी पर | सुनाये उन दलालों के किस्से और कहानियां भी | जिनकी वजह से बच्चियों की मासूमियत दरिंदों के बिस्तर पर दम तोड़ रही है | 
     मैं पूछता हूँ रवीश जी आपसे ? चलेंगे आप मेरे साथ आज फिर वहां ? है हिम्मत आपमें आपके भाई के खिलाफ खड़े होने की ? है हिम्मत आपमें पेशे से न्याय करने की ? सच के साथ खड़े होने की ? सही को सही गलत को गलत कहने की ? मैं जानता हूँ आप ये नहीं कर सकते | क्युकि सच का साथ देने के लिए आदमी का जमीर जिन्दा होना चाहिए | रीढ़ की हड्डी होनी चाहिए जो आदमी को जुल्म के सामने सीधा तन के खड़ा रखती है | जो अपना जमीर बेच चुके जिनके शरीर में रीढ़ की हड्डी नहीं वो भला क्या सच का साथ दे पाएंगे | रहने दीजिये सर आपसे न हो पायेगा |

     पत्रकार एक सामाजिक प्राणी है कुछ नहीं तो कम से कम 10 हजार लोग आपको सुनते होंगे | उन में से कई आपको अपना आदर्श मानते हैं | उनकी विचारधारा या सोचने की समझ आपको सुनते हुए विकसित होती हैमुझ जैसे साधारण लोग इस छोटी सी बात को समझते हैं | तो क्या ये बात आपको सम नहीं आती | सार्वजानिक जीवन जीने वाले आदमी को क्या आतंकियों के पक्ष में मुहीम चलाने की अनुमति दी जा सकती है ? जरा इस पर भी गौर कीजियेगा सर | आपको अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी | पत्रकारिता की आड़ में आपको आपका एजेंडा चलाने  की अनुमति नहीं दी जा सकती |
                       
     हाँ पर इसकी आड़ में गाली देने की अनुमति भी नहीं दी जा सकती | पर ये गाली देने वाले दोनों तरफ हैं सर | मुझे तो अक्सर देख लेने की धमकी देते हैं | अभी साल पहले मुझे ददवारे में पकड़ लिया था | गाली गलौज हुई सही टाइम पर कुछ मित्र मिल गए वरना आज आपको ये नहीं लिख पाता | हो सकता था कि उस दिन मैं सुजीत के जैसे तलवारों से काट दिया जाता| आप तो मेरी कब्र पर फातिहा पढने भी नहीं आते | क्युकि मैं आपके व्यक्तिगत और व्यापारिक हितों के ढांचे में फिट नहीं बैठता |

     जहाँ तक गाली गलौज का प्रश्न है मैं मानता हूँ ये शर्म का विषय है | जब आदमी तर्क से हारता है तो गाली गलौज का ही सहारा लेता है | पर हर बार एसा नहीं होता | मैं अग्रवाल हूँ | अपनी दुकान पर जाकर सबसे पहले उसके पैर छूता हूँ | वो हमारी पालनहार है | खाने के लिए वक्त की रोटी का प्रबंध करती है | सुबह से शाम ईमानदारी से ग्राहक चलाता हूँ | कोई लड़ भी ले तो पलट कर जबाब नहीं देता | वैसे ही आपके लिए आपकी पत्रकारिता भी आपके लिए माँ का दर्जा रखती होगी | आप नास्तिक हैं तो पैर तो नहीं छूते होंगे | पर मेरा विश्वास है कि इसके प्रति माँ की श्रद्धा अवश्य रखते होंगे | फिर जरा सोचिये जब आप अपनी पक्षपाती रिपोर्टिंग करते हैं तब क्या आप अपनी इस माँ से बलात्कार नहीं कर रहे होते हैं ? जब आप इशरत सी "आतंकी" को "मासूम" बताते हैं तब आप इसे "रंडी" कहकर अपमानित नहीं कर रहे होते हैं ? जब "भारत की बर्बादी" के नारे लगाने वाले को आप जनता में हीरो बनाते हैं तब क्या आप स्वयं इसकी बोली लगा कर इसकी "दलाली" नहीं कर रहे होते हैं ?

     मैं शिशु मंदिर का पढ़ा हूँ | हमारे आचार्य जी रोज हमें कथा सुनाते थे | एक बार भगवन गौतम बुद्ध की कहानी सुनाई | एक व्यक्ति तथागत की प्रसिद्धी से चिढ़ता था | वो रोज आता और बुद्ध को गाली सुनाता | पर बुद्ध प्रतिउत्तर में कुछ कहते बस मुस्कुरा भर देते | दिन महीने साल बीते | वो व्यक्ति उपेक्षा से त्रस्त हो गया | थक हार कर बुद्ध से बोला मैंने आपका इतना अपमान किया इतनी गाली दी आपको पर आप विचलित हुए | पलट कर कभी आपने कुछ कहा | क्यों ? तब तथागत बोले पुत्र मान लो तुम मुझे भोजन परोसो और मैं खाने से इंकार कर दूँ तो वो भोजन किसके पास रहेगा | उसने कहा वो तो मेरे पास ही रहेगा | बुद्ध ने कहा बस मैंने तुम्हारी गाली भी स्वीकार नहीं कि वत्स | आप लोग बुद्ध की विरासत सँभालने का दावा करते हैं | बुद्ध की इतनी साधारण सीख आप महान लोगों के समझ में नहीं आई | जिसके पास जो है वही आपको प्रदान करेगा | आपके ऊपर है कि आप उसे स्वीकार करते हैं या अस्वीकार |

     हालाँकि आपके कारनामे बहुत हैं लिखने के लिए | पर मैं आप जितना लिक्खाड़ नहीं हूँ | मेरे कम लिखे को ज्यादा समझना | मुझे पता है सर कि आप बड़े पत्रकार हैं | मुझे जबाब देने का कष्ट हर्गिज नहीं करेंगे | पर मेरे इन प्रश्नों पर सरसरी निगाह जरूर डालियेगा सर | कम से कम आईना सामने रखकर अपनी आँखों में आँखें डालकर इनमे से एक प्रश्न का उत्तर खुद को अवश्य दीजियेगा सर | और हाँ ये सब करते हुए अपना अपना मुंह मत छिपाना सर | क्युकी आपके ज्यादातर उत्तर आपको आपकी ही नजरों में गिराने के लिए काफी हैं |