Tuesday, 21 February 2017

एक खत रवीश जी के नाम

प्रिय रविश जी,

     आपको तब से सुन रहा हूँ जब शायद स्नातक में रहा होऊंगा | हिंदी पत्रकारिता करने की चाह रखने वाला शायद ही एसा कोई व्यक्ति हो जिसने आपको सुना हो | या आप जिसके आदर्श हों | सीधी सपाट गाँव की सुगंध से भीगी आपकी अल्हड़ भाषा मानो सीधे दिल में उतरती थी | ग्राउंड रिपोर्टिंग में तो आपका जबाब ही नहीं था | आप उस न्यूज़ के उस पहलू को दिखाते थे जिसे शायद कोई सोच भी सके | पर धीरे धीरे आपके व्यव्हार में परिवर्तन आता गया | आपका दोहरा चेहरा उजागर होने लगा | एक आतंकी आपको मासूम लगने लगी | "भारत तेरे टुकड़े होंगे " का उद्घोष करने वालों के लिए आपने स्क्रीन तक काली कर दी | उस दिन मेरा सर शर्म से झुक गया | किसे अपना आदर्श मान बैठा था मैं ? किसके जैसे बनने की चाह ह्रदय में संजोये था मैं ? मैं उस पत्रकार रवीश का प्रशंसक था जिसने दिल्ली कि बदनाम गलियों में अपना प्राइम टाइम कर वैश्यायों का दर्द हम सबके सामने रखा था उसका नहीं जिसने देशद्रोही नारों के समर्थन में स्क्रीन काली कर दी |
     एक बात सोचने की है | क्या "भारत की बर्बादी" के बाद आप भी अपना प्राइम टाइम कर पाएंगे सर ? जिन लोगों का समर्थन आप कर रहे हैं उन्हीं के भाई बन्धु इराक में महिलाओं को नंगा करके कोडियों में बेचते हैं | आशा करता हूँ कि आप इन तथ्यों से अनभिज्ञ तो नहीं होंगे | सोचिये आप इराक में हैं और आपका सुप्रसिद्ध दिल्ली वाला प्राइम टाइम करना चाहते हैं | क्या कर सकेंगे आप ? फिर ऐसे नारों का अंध समर्थन क्यों ? क्या अच्छा नहीं होता कि बजाय स्क्रीन काली करने के आपने कहा होता कि नारें लगे हैं तो इसका दोषी कौन है ? काश आपने मेरे देश को गाली देने वालों के विरोध में अपनी स्क्रीन काली की होती |

     खैर छोडिये इसे | स्क्रीन काली करना आपकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता थी | आपके पक्षपात का विरोध करना हमारी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है | ये जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हाई वे है सर | इसे बाईडायरेक्शनल रहने दीजिये | इसे यूनीडायरेक्शनल मत बनाइये | आपको अधिकार है आलोचना का | आपका अधिकार हमारे सर माथे पर | आलोचना खूब कीजिये आप खूब निंदा कीजिये पर साथ में दूसरों को समीक्षा का अधिकार भी दीजिये | हमें हमारे समीक्षा के अधिकार से वंचित कीजिये सर | पत्रकार रवीश से जज रवीश मत बनिए सर |

     मुझे याद है आपका गौ हत्या पर प्रतिबन्ध के समय का आपका प्राइम टाइम | बजाय ये बताने के कि गौ माँ के दूध से बुद्धि का विकास होता है आप उसके मांस खाने के फायदे बता रहे थे |आप अपने दर्शकों को बता रहे थे कि गौ मांस में इतना प्रोटीन होता है उतना जिंक होता है | जो स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है | शर्म नहीं आती आपको ? कल को कोई सिरफिरा व्यक्ति अगर सर्दी में कुरान जलाने की बात करने लगे तब क्या करेंगे आप ? आप उस सिरफिरे व्यक्ति को रोकने का प्रयास करेंगे या इसे उसका सर्दी से बचने का नैसर्गिक अधिकार बताकर उस सिरफिरे की इस घिनौनी हरकत का विरोध करेंगे ? क्या तब भी आप ये बताएँगे कि एक पन्ने को जलाने से इतने जूल गर्मी या इतने वाट ऊष्मा उत्पन्न होगी ? नहीं | फिर हिन्दुओं के लिए पूज्य गौ के लिए आपका दुराग्रह क्यों ? आपकी कथित धर्मनिरपेक्षता की बलिवेदी पर सिर्फ गौ की ही क़ुरबानी क्यों सर ?
                                   
     अख़लाक़ की मृत्यु पर चूड़ी तोड़ विधवा प्रलाप करने वाले आप लोग प्रशांत पुजारी की नृशंस हत्या पर कभी नहीं बोलते | वो चाहे केरल का सुजीत हो या आगरा का अरुण माहौर | उनकी रूह किसी शमशान में आज तक आपके प्राइम टाइम शो की राह तक रही है | और ये समझना कि ये सिर्फ दो-तीन नाम हैं | ऐसे अनगिनत नाम हैं जो मार दिए गए | कई तो ऐसे हैं जिनकी लाशें तक उनके परिवारीजनो को नसीब हुईं | नयी सड़क पर चलने वाली आपकी NDTV की OP वैन उनकी लाशों को कुचलती हुई कभी JNU गयी तो कभी बिहार | पहुंची तो इन अभागों के द्वार जिनका रास्ता शायद आपको कभी मिला नहीं | या सच कहूँ तो आपने कभी ढूँढने की कोशिश भी नहीं की | अफ़सोस कभी आपको घडी का समय मिला | काश इन मजलूमों को भी आपके वो १५ मिनट नसीब हुए होते | काश कभी इनके लिए भी आपने प्राइम टाइम किया होता |

     आज भी जब आपके भ्राता श्री का नाम सेक्स स्केंडल में उछला है आपने चुप्पी साध ली है | एक कार्यक्रम में किसी ने आपसे तल्ख़ प्रश्न कर दिया था | तब आप सांसे उखाड़ के चिल्ला चिल्ला के पूछ रहे थे कि “जो 25 हेलीकाप्टर लेकर उड़ता है वो दलाल है या नहीं” ? अब आप पूछिये अपने बड़े भैया से कि वो लड़कियों सप्लायर हैं या नहीं | पूछिये न सर राडिया टेप में आने वाली अपनी सहकर्मी से कि नीम का पत्ता कडवा है या नहीं ? आप सभी को दलाल कहिये, अंधभक्त कहिये, चमचा कहिये या गुंडा कहिये पर अगर सामने वाला आपको खबरंडी बोल दे तो टसुये मत बहाइये सर | ये विक्टिम कार्ड मत खेलिए सर | ये फाउल है |
                             
     सुना है सर आप बड़े क्रिएटिव हैं | आपको TRP की परवाह भी नहीं | तो क्यों न आज आप अपने भैया के खिलाफ अपनी क्रियेटिविटी दिखाएँ | चलिए रवीश जी आज वापस उन गलियों में चलें जहाँ आपने अपना सुप्रसिद्ध प्राइम टाइम किया था | उन बदनाम बस्तियों की गाथा दुबारा सुनाएँ जनता को | किस तरह भारत की तरुणाई सिसक रही है अपनी बेबसी पर | सुनाये उन दलालों के किस्से और कहानियां भी | जिनकी वजह से बच्चियों की मासूमियत दरिंदों के बिस्तर पर दम तोड़ रही है | 
     मैं पूछता हूँ रवीश जी आपसे ? चलेंगे आप मेरे साथ आज फिर वहां ? है हिम्मत आपमें आपके भाई के खिलाफ खड़े होने की ? है हिम्मत आपमें पेशे से न्याय करने की ? सच के साथ खड़े होने की ? सही को सही गलत को गलत कहने की ? मैं जानता हूँ आप ये नहीं कर सकते | क्युकि सच का साथ देने के लिए आदमी का जमीर जिन्दा होना चाहिए | रीढ़ की हड्डी होनी चाहिए जो आदमी को जुल्म के सामने सीधा तन के खड़ा रखती है | जो अपना जमीर बेच चुके जिनके शरीर में रीढ़ की हड्डी नहीं वो भला क्या सच का साथ दे पाएंगे | रहने दीजिये सर आपसे न हो पायेगा |

     पत्रकार एक सामाजिक प्राणी है कुछ नहीं तो कम से कम 10 हजार लोग आपको सुनते होंगे | उन में से कई आपको अपना आदर्श मानते हैं | उनकी विचारधारा या सोचने की समझ आपको सुनते हुए विकसित होती हैमुझ जैसे साधारण लोग इस छोटी सी बात को समझते हैं | तो क्या ये बात आपको सम नहीं आती | सार्वजानिक जीवन जीने वाले आदमी को क्या आतंकियों के पक्ष में मुहीम चलाने की अनुमति दी जा सकती है ? जरा इस पर भी गौर कीजियेगा सर | आपको अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी | पत्रकारिता की आड़ में आपको आपका एजेंडा चलाने  की अनुमति नहीं दी जा सकती |
                       
     हाँ पर इसकी आड़ में गाली देने की अनुमति भी नहीं दी जा सकती | पर ये गाली देने वाले दोनों तरफ हैं सर | मुझे तो अक्सर देख लेने की धमकी देते हैं | अभी साल पहले मुझे ददवारे में पकड़ लिया था | गाली गलौज हुई सही टाइम पर कुछ मित्र मिल गए वरना आज आपको ये नहीं लिख पाता | हो सकता था कि उस दिन मैं सुजीत के जैसे तलवारों से काट दिया जाता| आप तो मेरी कब्र पर फातिहा पढने भी नहीं आते | क्युकि मैं आपके व्यक्तिगत और व्यापारिक हितों के ढांचे में फिट नहीं बैठता |

     जहाँ तक गाली गलौज का प्रश्न है मैं मानता हूँ ये शर्म का विषय है | जब आदमी तर्क से हारता है तो गाली गलौज का ही सहारा लेता है | पर हर बार एसा नहीं होता | मैं अग्रवाल हूँ | अपनी दुकान पर जाकर सबसे पहले उसके पैर छूता हूँ | वो हमारी पालनहार है | खाने के लिए वक्त की रोटी का प्रबंध करती है | सुबह से शाम ईमानदारी से ग्राहक चलाता हूँ | कोई लड़ भी ले तो पलट कर जबाब नहीं देता | वैसे ही आपके लिए आपकी पत्रकारिता भी आपके लिए माँ का दर्जा रखती होगी | आप नास्तिक हैं तो पैर तो नहीं छूते होंगे | पर मेरा विश्वास है कि इसके प्रति माँ की श्रद्धा अवश्य रखते होंगे | फिर जरा सोचिये जब आप अपनी पक्षपाती रिपोर्टिंग करते हैं तब क्या आप अपनी इस माँ से बलात्कार नहीं कर रहे होते हैं ? जब आप इशरत सी "आतंकी" को "मासूम" बताते हैं तब आप इसे "रंडी" कहकर अपमानित नहीं कर रहे होते हैं ? जब "भारत की बर्बादी" के नारे लगाने वाले को आप जनता में हीरो बनाते हैं तब क्या आप स्वयं इसकी बोली लगा कर इसकी "दलाली" नहीं कर रहे होते हैं ?

     मैं शिशु मंदिर का पढ़ा हूँ | हमारे आचार्य जी रोज हमें कथा सुनाते थे | एक बार भगवन गौतम बुद्ध की कहानी सुनाई | एक व्यक्ति तथागत की प्रसिद्धी से चिढ़ता था | वो रोज आता और बुद्ध को गाली सुनाता | पर बुद्ध प्रतिउत्तर में कुछ कहते बस मुस्कुरा भर देते | दिन महीने साल बीते | वो व्यक्ति उपेक्षा से त्रस्त हो गया | थक हार कर बुद्ध से बोला मैंने आपका इतना अपमान किया इतनी गाली दी आपको पर आप विचलित हुए | पलट कर कभी आपने कुछ कहा | क्यों ? तब तथागत बोले पुत्र मान लो तुम मुझे भोजन परोसो और मैं खाने से इंकार कर दूँ तो वो भोजन किसके पास रहेगा | उसने कहा वो तो मेरे पास ही रहेगा | बुद्ध ने कहा बस मैंने तुम्हारी गाली भी स्वीकार नहीं कि वत्स | आप लोग बुद्ध की विरासत सँभालने का दावा करते हैं | बुद्ध की इतनी साधारण सीख आप महान लोगों के समझ में नहीं आई | जिसके पास जो है वही आपको प्रदान करेगा | आपके ऊपर है कि आप उसे स्वीकार करते हैं या अस्वीकार |

     हालाँकि आपके कारनामे बहुत हैं लिखने के लिए | पर मैं आप जितना लिक्खाड़ नहीं हूँ | मेरे कम लिखे को ज्यादा समझना | मुझे पता है सर कि आप बड़े पत्रकार हैं | मुझे जबाब देने का कष्ट हर्गिज नहीं करेंगे | पर मेरे इन प्रश्नों पर सरसरी निगाह जरूर डालियेगा सर | कम से कम आईना सामने रखकर अपनी आँखों में आँखें डालकर इनमे से एक प्रश्न का उत्तर खुद को अवश्य दीजियेगा सर | और हाँ ये सब करते हुए अपना अपना मुंह मत छिपाना सर | क्युकी आपके ज्यादातर उत्तर आपको आपकी ही नजरों में गिराने के लिए काफी हैं |

Sunday, 29 January 2017

गाँधी जी को पढ़ाइये ... छिपाइए मत

     जानते हो आज 12 साल का बच्चा गाँधी जी की बहिन मतारी क्यों करता है ? क्योंकि 5 साल की उमर से हमारे ऊपर गाँधी थोप दिए जाते हैं । हमें बताया जाता है बेटा आज़ादी से पहले बाद में एक ही भगवान हुए और वो हैं महात्मा गांधी । ये लो ढोलक मंजीरा और गाओ - "दे दी हमें आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल । या धन धन गाँधी जी महाराज दुखियों के दुःख हरने वाले ।" 

     26 जनवरी की रैली में गुरूजी इस लौंडे को मजबूर कर देते हैं चाँद घुटाने के लिए । बोलते हैं "बेटा वो देश के लिए जान दे दिए और तुम गंजे होके धोती न पहन रहे ।" गुरूजी के इस इमोशनल अत्याचार पे छोरा टूट जाता है । चार दिन पहले तक लौंडा सलमा की मोहब्बत में सलमान खान हुआ जा रहा था । बीच की मांग काढ़ के सस्ता चश्मा लगाये सलमा की गली से ये बाल झटक के निकलता था ।


     आज 25 जनवरी की शाम सईद मियां आके इसके बाल ले जाते हैं । छोरे को सफ़ेद लुंगी और हैरी पॉटर का 6 नंबर का चश्मा मिलता है । ले बेटा पहन ले और बोल जय गान्ही बाबा की । चिल्ला जाड़े में कंपकंपाता लौंडा गाँधी जी को गरिया रहा होता है । जिस सलमा को बाल झटक झटक के पटाया था अब उसी के घर के आगे छोरे का जलूस निकल जाता है ।

     असली मजा तब आता है जब लौंडा फेसबुक चलाना शुरू करता है । तब इसे पता चलता है कि बापूजी तो कर्रे वाले पलंगतोड़ आशिक थे । सुशीला, मनु, अलाने की पुतबहू और फलाने की परपोती तो शाम होते ही बापू के बिस्तर पे सजती थी । तब ये भड़का आशिक सलमा को याद कर करके टसुए बहाता है और उन्हीं गान्ही बाबा को गरियाता है जिनकी जय-जयकार कभी मास्टर जी ने बुलवाई थी |
     @#$%* तुमाए चक्कर में हमाये बचपन की मोहब्बत चाँद मियां से ब्याह गयी । हरामखोर हर साल का अलग माँडल निकालता है । हमसे ब्याह पढा होता तो बस दो बच्चे करते । काहे कि बच्चे दो ही अच्छे | ट्रक पे भी लिखा होता है: हम दो हमारे दो | छोरे का नाम खाते चुन्नू और छोरी का मुन्नी । नरक में कुम्भीपाकम् हो इस $%@# गान्ही का । तब हम पढ़े लिखे सो कॉल्ड इंटेलेक्चुअल लोग बोलते हैं कि तुम बहुत बद्तमीज़ हो बापू को गाली लिख रहे हो । और ब्लाह ब्लाह ।
             
     मेरे ख्याल से दिक्कत वहां से शुरू होती है जब हम अपने माइंडसेट दूसरों पर थोपते हैं । अरे वो पढ़ाइये जो सच है । बच्चे बहुत होशियार हैं आजकल । आज नहीं तो कल वो सच्चाई पता कर लेंगे । आज सबके पास इंटररनेट है भाई । आपकी अय्याशी के सबूत यहाँ हाई रेसोलूशन में मौजूद है । बेहतर है आप बच्चो को सब बताइए | किस परिस्तिथि में उन्होंने क्या किया - उन्हें ये सब बताइए | ताकि आगे चलकर वो अपने मन में महापुरुषों के बारे में गलत धारणा न बनायें |
     यहाँ गाँधी जी का सिर्फ उदाहरण लिया गया है । आप अपने आस पास छात्रों के विचार सुनिए | वो हर महापुरुष पर ऊँगली उठा रहे हैं । आप ध्यान से देखिये आजकल हर महापुरुष इसी तरह गाली खा रहा है । और आप इसे गलत भी नहीं कह सकते | हर समाज के घरों में अपनी अपनी तस्वीरें सजी हैं । खाँचे खिंच चुके हैं । लोग बँट रहे हैं । और ये बहुत गलत हो रहा है । आज नहीं तो कल आपको इस पर ध्यान देना ही होगा । बेटर टुडे देन टुमारो ...

पुण्यतिथि पर महात्मा गाँधी जी को सादर नमन _/\_

Saturday, 28 January 2017

जौहर- गाथा

मेरे लिये शब्द सिर्फ शब्द नहीं होते | वो जीवंत परिवेश होते हैं | मैं प्रेमचन्द को पढते वक्त खुद को होरी का भाई पाता हूँ | निर्मला को पढते समय मैने उसे मेरी सखी पाया | उसके हालात पर मेरी आखों में अंगार थे | उसी तरह जब मैं जौहर शब्द सुनता हूँ तो खुद को आग की लपटों में घिरा पाता हूँ | मैं आखेँ मूँद भी लूँ तो भी राजपूतानियों के जलते शरीरों के दृश्य मेरे अंत:करण को बींध देते हैं | कानों को बन्द भी कर लूँ फिर भी उनकी कारूण चीखें मेरे कानों के परदे चीर देती हैं |
बचपन में चाय पर ज़रा सा जल गया था एक बार | घर में कोहराम मच गया था | कोलगेट लगाओ दही लाअो | यह करो तो छाला नहीं पडेगा वह करो तो निशान चला जायेगा | तनिक सोचिये कैसा वीभत्स दृश्य होगा वो जब सैकडों हजारों महिलायें इस्लामी अत्याचारियों से अपनी पवित्र देह बचाने के लिये जौहर में प्रवेश कर रही होंगी | रूह तो काँपी होगी उनकी एक बार | पैरों ने भी साथ नहीं दिया होगा शायद | फिर भी अपनी इज्ज़त की रक्षा के लिये , मुगल शासकों के हरम में रखेल बनने की जगह उन्होने मौत को गले लगाना ऊचित समझा |

दीगर-ए-बात है वो जहर खा के भी जान दे सकतीं थीं | पर उन्होने जौहर चुना | मौत का सबसे कठिन रास्ता | जलती चिता में ज़िन्दा सशरीर प्रवेश | बस रणभूमि से ख़बर आयी राणा के हुतात्मा होने की और इधर पग बढ गये जौहर की तरफ | क्यूँ ? क्युकि मरने के बाद भी इस्लामी दहशदगर्द उसके शरीर की बोटी बोटी नोच लेंगे | सुनी थी पद्मिनी ने राजा दाहिर की दोनों पुत्रियों की कहानियां | किस तरह दरिन्दों ने मृत शरीरों को अपवित्र किया था | यही हाल राणा जी हत्या के बाद उसके शरीर का होना था |

इसीलिये उसने हीरे नहीं चाटे | इसीलिये उसने जहर नहीं खाया | इसीलिये उसने अपनी कटार से अपनी अंतडियाँ नहीं काटी | इसीलिये उसने जलती चिता में प्रवेश किया | ताकि उसका शरीर भस्मीभूत हो जाये | ताकि उसकी देह को विधर्मी स्पर्श भी न कर पायें | वो तो राणा के प्रेम में पगी थी | उसी प्रेम के लिये उसने खुद को कुर्बान कर दिया | राणा ने भी अपनी जान की बाजी लगा उसकी रक्षा की | अपने जीते जी उन्होने वाहशी खिलजी को राजपूतों की इज्ज़त से खेलने नहीं दिया | प्रेम इसे कहते हैं निर्देशक महोदय |
प्रेम 2 आत्माओं का मिलन होता है | अलाउद्दिन खिलजी ने जो किया उसे वासना कहते हैं | और प्रेम में तो वासना का दूर दूर तक स्थान नहीं होता | अलाउद्दिन रानी पद्मिनी के शरीर को पाना चाहता था | उनकी आत्मा को नहीं | इसीलिये इतिहास ने खिलजी को कामी कीडा लिखा और पद्मिनी को आत्मबलिदानी | ये इतिहास का वो न्याय है जो खिलजी और उसके मानस पुत्रों के माथे पर कलंक है | खिलजी के वंशज लाख कोशिश कर लें पर इस कलंक को अपने माथे से वो धो नहीं सकते |
आप पद्मिनी के चरित्र को कलंकित करना चाहते हैं | अल्टरनेट वियू के नाम पर आप राजपूती अस्मिता को तार तार करना चाहते हैं | पर य़ाद रखिये जिसे खिलजी जैसे दुर्दांत हत्यारे नहीं कर पाये उसे आप जैसे तुच्छ फिल्मकार भी नहीं कर सकते | क्युकि सूरज पर थूकने वाले शायद ये भूल जाते जाते हैं कि उनका थूक पलट कर उनके मुंह पर ही गिरता है |

Sunday, 15 January 2017

बिल्लियों के कोसने से कभी उल्काएं नहीं गिरा करतीं

     ढाका की मलमल के बारे में आप सभी ने सुना होगा | कहते हैं कि आप ढाका की मलमल वाली चादर को एक अंगूठी से निकाल सकते थे | इतनी बारीक़ और महीन होती थी ये | यही कहानिया कमोबेश भारत के हर हिस्से की हैं | हमने एसा लोहा बनाया जिसपे हजारों सालों से जंग नहीं लगी | पर ये सब हवा में नहीं हुआ | इसे करने में हमारे पूर्वजों की दिन रात की मेहनत और ज्ञान था |
                                        
     फिर अंग्रेज आये | अपनी रिपोर्ट में वायसराय ने लिखा “ मैं हैरान हूँ भारत को देखकर | यहाँ कोई गरीब नहीं | सब व्यापारी है, किसान हैं | सबके अपने काम धंधे हैं | सबके यहाँ स्वर्ण भंडार हैं | मैं यहाँ इतने दिनों से हूँ | मैंने किसी को भीख मांगते नहीं देखा | सिवाय साधू सन्यासियों के | पर वो समाज के हित में मांगते हैं | अपने लिए नहीं | ये हैरत की बात है ” ये था इंग्लॅण्ड के भारत में तत्कालीन वायसराय के शब्दों में हमारा भारत | नाम नहीं लिख रहा हूँ | गूगल कीजियेगा |

     धन- धान्य और तमाम तरह के खनिजों से परिपूर्ण सोने की चिड़िया कहे जाने वाली इस भारत भूमि को लूटने के नए नए तरीके खोजे जाने लगे | तमाम मीटिंग्स हुई | निष्कर्ष निकाले गए | निर्णय लिए गए | चूंकि तब तक अंग्रेज भारतवर्ष के भाग्य विधाता बन चुके थे सो उनके लिए गए निर्णय भारत का भविष्य थे | उन लिए गए निर्णयों में से एक था भारत के हथकरघा उद्योग को बर्बाद करने का निर्णय | आधुनिकीकरण के नाम पर तमाम छोटी छोटी ग्रामोद्योग इकाइयों को बंद करा दिया गया |
     भारत भर से कपास ढाका की जगह लन्दन जाने लगी | वहां से मशीन का बुना सस्ता और घटिया कपडा आने लगा | चूंकि ये कपडा बहुत ही सस्ता और दिखने में आकर्षक था | सो हमारे भारतीय भाइयों ने इसे हाथों- हाथ लिया | धीरे- धीरे बुनकरों के घर में फांका पड़ना शुरू हुआ | उन्हें दो जून की रोटी भी बमुश्किल नसीब होने लगी | मजबूरन उन्हें अपने पूर्वजों के हुनर, जो पीढ़ी दर पीढ़ी उनके हाथों में रचा बसा था, उसे तिलांजलि देनी पड़ी |
     आप सोच रहे होंगे मैं इसे क्यों सुना रहा हूँ ? बताता हूँ | आज आपको बहुत से तथ्य पता चलेंगे | लेख थोडा लम्बा हो जायेगा अत: आपसे धैर्य से पूरा पढने की गुजारिश कर रहा हूँ |
     अभी हाल ही में मोदी जी खादी ग्रामोद्योग की डायरी और केलेंडर पर सूत कातते नजर आये | ये डायरी और केलेंडर हर साल छपते हैं | इसमें कुछ नया नहीं है | पर इस बार फ्रंट पेज पर गाँधी जी की नहीं बल्कि आज के आइकोन भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर थी | बस यही विवाद की जड़ है | हालाँकि ये प्रथम बार नहीं है जब फ्रंट पेजेस पर गाँधी जी नदारद हैं | विगत वर्षों में कई बार एसा हुआ है | पर चूंकि इस बार केंद्र में मोदी जी हैं तो विवाद उठना लाजमी है |
                               modi with gandhi charkha
     हिम्मत कैसे हुई संघ के एक स्वयंसेवक की गाँधी को रिप्लेस करने की ? माना आपको अपार जनसमर्थन प्राप्त है | पर कुछ मामले ऐसे हैं जहाँ लकीर पीटना अनिवार्य है | कहते भी है “ मजबूरी का नाम महात्मा गाँधी |” और आपने साहब उन्ही गाँधी को रिप्लेस कर दिया | ऐसे में वो लोग जिनकी रोजी रोटी गाँधी नाम से चलती है, भला वो कैसे चुप रह सकते हैं ? माना आपके विचारों से प्रेरित हो आज का युवा खादी खरीदने लगा है | आकंड़ो को अगर देख लें तो खादी की बिक्री के आकंडे की सुई जो विगत बीस वर्षो 5-6 % की बढ़ोतरी पर टिकी हुई थी | आज आपके शासन काल में वही सुई मीटर फाड़ के 34% का ग्रोथ दिखाती है |
     क्या जरूरत है साहब आपको खादी की फिकर करने की ? काहे नहीं उन कुकुरमुत्तों को चैन से उगने और फलने फूलने देते आप ? पड़ा रहने दीजिये चरखे को इक कौने में | लगने दीजिये उसे धूल-धक्कड़ | बाकी नेताओ की तरह आप भी बापू के जन्मदिन पे जाइए आश्रम में | चढ़ा आइये 2 फूल उस चरखे की मैय्यत पर | जब आज तक यही होता आया है तो वही होने दीजिये न | आप काहे चरखे को अपने अंगोछे से पोछ अपने हाथ ख़राब करते हैं ? मरने दीजिये उन बुनकरों के सपनों को, फटने दीजिये उस मलमल की चादर को जो कभी अंगूठी से पार हो जाया करती थी | पहले अंग्रेजों ने उन्हें लूटा, अब चरखे की आड़ में गाँधी के वंशज लूटेंगे | आपको क्या ?
     साहब हम भारतीय इसी लायक हैं | 1200 सालों की गुलामी हमने युही नहीं झेली | आपका विरोध तार्किक आधार पर नहीं है | ये हो भी नहीं सकता | क्युकि गाँधी को बेचने वाले तर्क की कसौटी पर कहीं खरे नहीं उतरते | चूंकि बात अब लेगेसी की हो रही है | तो गाँधी जी की लेगेसी और वर्तमान पर विमर्श करना और उसे आप तक पहुँचाना हमारा परम कर्तव्य है | दो ट्वीट पेशे- खिदमत हैं |

    1. “Since it’s happy women day today. Men should be allowed to touch them to feel happiness.”
    2. “I love to watch women playing at Wimbledon. The trouble is I keep watching the wrong balls.”

मेरे हिंदी पाठकों के लिए मैं हिंदी अनुवाद लिख रहा हूँ |
   1. “चूंकि आज महिला दिवस है इसीलिए आज पुरुषों को उन्हें छूकर खुश होने की स्वतंत्रता होनी चाहिए |”
   2. “मुझे महिलाओं को विम्बलडन में खेलते देखना पसंद है |” माफ़ कीजिये इससे आगे का अनुवाद मैं नहीं लिख सकता | बस इतना समझ लीजिये कि आगे जो कहा गया है वो बहुत ही बदतमीज़ और घटिया मानसिकता को दर्शाता है | एक सभ्य परिवार से आने वाला कभी एसा नहीं कह सकता |
     हाँ ये मेरे ट्वीट नहीं हैं | मैं संघ का स्वयंसेवक हूँ | मुझे शाखाओं में “यत्र नारीयस्तु पूज्यते” का पाठ पढाया गया है | मैं वीर शिवाजी की उस परंपरा का वाहक हूँ जिसने विजित गौहर खान में अपनी माँ का अक्स देख उन्हें ससम्मान पालकी में बैठाकर उनके शिविरों में वापस भेजा था । ये उदगार हैं महान महात्मा गाँधी जी के प्रपोत्र तुषार गाँधी के | जिन्हें आपने कल टीवी पर कलपते देखा होगा | कल उन्होंने कहा कि “बापू अब KVIC को राम-राम कह दें. यूं भी KVIC ने खादी और बापू दोनों की विरासत को कमजोर ही किया है. लिहाजा मोदी को चाहिए कि वो इस कमीशन को निरस्त कर दें |”
                                  

                                  
     इन महानुभाव ने विरासत चुराने की बात की है | मैं यहाँ इन्हें गाँधी जी की सुशीला बेन और मनु बेन को अपने बिस्तर पर सुलाने वाली विरासत से नहीं जोड़ रहा | यद्यपि ऊपर लिखे 2 ट्वीट से ये स्पष्ट है कि ये किस विरासत की बात कर रहे हैं | फिर भी मैं इनका ध्यान कुछ एतिहासिक तथ्यों की तरह खींचना चाहूँगा |
     1. भारत के इतिहास में पूर्ण स्वराज्य की मांग करने वाले वीर सावरकर प्रथम व्यक्ति थे | उन्होंने सन 1900 में पूर्ण राजनैतिक स्वतंत्रता की बात की | उस समय तक कांग्रेस के अधिवेशनों में उनकी अंग्रेजों के प्रति भक्ति प्रकट करने के लिए “लॉन्ग लिव द किंग” गाया जाता था | बाद में वीर सावरकर से प्रभावित हो यही मांग आज़ाद भगत सिंह आदि क्रांतिकारियों ने की | उस समय गाँधी जी की लीडरशिप में कांग्रेस की मांग डोमिनियन स्टेट की थी | यानि कि शासन तो अंग्रेजों का ही हो पर उसमे थोड़ी बहुत सहभागिता भारतियों की हो | जब अंग्रेजों के अत्याचारों के विरूद्ध भारतियों में आक्रोश बढ़ा और अंग्रेजों की सेफ्टी वाल्व कांग्रेस इस आक्रोश को थामने में असफल रही | तब जाकर 1929 में गाँधी जी द्वारा पूर्ण स्वतंत्रता की मांग की गयी | तो क्या ये कहा जा सकता है कि गाँधी जी ने सावरकर जी के विचारों को चोरी किया और अपने नाम से उनका प्रचार किया ?
                               
     2. सर्वप्रथम 1905 में वीर सावरकर ने विदेश निर्मित वस्त्रों की होली जलाई | सर्वप्रथम उन्होंने भारत के हथकरघा उद्योग की बर्बादी को समझा | बुनकर भाइयों के हक़ की आवाज बने | गाँधी जी ने यही काम ठीक 16 साल बाद 1921 में किया | तब जाकर उन्होंने चरखा चलाया | तब उनका चरखा बुनकरों के संघर्ष का प्रतीक बना |
     चरखा चलाने का उद्देश्य बिलकुल स्पष्ट था | अपने हाथ की बुनी खादी पहनों और विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार करो | उन्होंने खुद एक दुशाला एक धोती पहनी | उनका कहना था की अपनी आवश्यकताओं को कम से कम करों | पर आवश्यकताओं की सीमित रखने का संदेश तो स्वामी विवेकानंद ने उनसे दशकों पहले दिया था | “सिम्पल लिविंग एंड हाई थिंकिंग |” अब चूंकि गाँधी जी ने भी बिलकुल यही सन्देश दिया तो क्या यह कहा जायेगा कि गाँधी जी ने स्वामी विवेकानंद जी की विरासत चुरा ली ?
     लेख बहुत लम्बा खिंच चूका है | मैं वापस अपनी प्रस्तावना पर आता हूँ | गाँधी ने अपने लिए चरखा नहीं चलाया | उन्हें भारत के मुख्य आसामी फाइनेंस करते थे | वो चाहते तो आसानी से बढ़िया इंग्लॅण्ड का बुना सूट पहनते और उन्होंने पहना भी | किन्तु गरीब बुनकरों की दुर्दशा देख गाँधी जी ने उनके लिए चरखा उठाया | गाँधी जी का चरखा मुख्यत: अंग्रेजों की उस लूट खसोट वाली औपनिवेशिक नीति के विरुद्ध था जिसके तहत अंगेजों ने भारत को लूट अपना घर भरा | जिसने लाखो बुनकरों से उनके चरखे छीन उन्हें पैसे पैसों का मोहताज कर दिया |
     इस चरखे ने लोगों को प्रेरणा दी अंग्रेजों के खिलाफ उठ खड़ा होने के लिए | उनका चरखा आर्थिक आज़ादी के संघर्ष का प्रतीक था | पिछले 120 सालों के इस संघर्ष को गाँधी की तस्वीर को कौड़ियों के मोल बेचने वाले तुषार गाँधी और उन जैसे लोग नहीं समझ सकते | आज ग्रामोद्योग बढ़ रहा है | ग्रामीण अंचल के युवा उद्योगों के लिए लोन देकर मोदी सरकार गाँधी और दीन दयाल के ग्राम स्वराज्य के सपनो को साकार कर रही है |
     आज ये लोग जो विरोध में हैं वो इसीलिए बौखलाए नहीं हैं कि मोदी की तस्वीर लग गयी | वो इसीलिए बौखला गए हैं कि जिस विरासत को नोच नोच कर उन्होंने आज तक खाया है वो विरासत अब मोदी की हो रही है | अगर यही हाल रहा तो इन विरासतखोरों के लिए खाने के बांदे पड जायेंगे | पर भारत की माटी का एक सपूत अभी जिन्दा है | वो बापू को युही लुटने नहीं देगा | वो चौकीदार अपने डंडे से आपको युही रोकता रहेगा | आप भी अपना कोसने का कीर्तन जारी रखिये | क्युकि बिल्ली के कोसने से कभी उल्काएं नहीं गिरा करतीं |