Sunday, 29 January 2017

गाँधी जी को पढ़ाइये ... छिपाइए मत

     जानते हो आज 12 साल का बच्चा गाँधी जी की बहिन मतारी क्यों करता है ? क्योंकि 5 साल की उमर से हमारे ऊपर गाँधी थोप दिए जाते हैं । हमें बताया जाता है बेटा आज़ादी से पहले बाद में एक ही भगवान हुए और वो हैं महात्मा गांधी । ये लो ढोलक मंजीरा और गाओ - "दे दी हमें आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल । या धन धन गाँधी जी महाराज दुखियों के दुःख हरने वाले ।" 

     26 जनवरी की रैली में गुरूजी इस लौंडे को मजबूर कर देते हैं चाँद घुटाने के लिए । बोलते हैं "बेटा वो देश के लिए जान दे दिए और तुम गंजे होके धोती न पहन रहे ।" गुरूजी के इस इमोशनल अत्याचार पे छोरा टूट जाता है । चार दिन पहले तक लौंडा सलमा की मोहब्बत में सलमान खान हुआ जा रहा था । बीच की मांग काढ़ के सस्ता चश्मा लगाये सलमा की गली से ये बाल झटक के निकलता था ।


     आज 25 जनवरी की शाम सईद मियां आके इसके बाल ले जाते हैं । छोरे को सफ़ेद लुंगी और हैरी पॉटर का 6 नंबर का चश्मा मिलता है । ले बेटा पहन ले और बोल जय गान्ही बाबा की । चिल्ला जाड़े में कंपकंपाता लौंडा गाँधी जी को गरिया रहा होता है । जिस सलमा को बाल झटक झटक के पटाया था अब उसी के घर के आगे छोरे का जलूस निकल जाता है ।

     असली मजा तब आता है जब लौंडा फेसबुक चलाना शुरू करता है । तब इसे पता चलता है कि बापूजी तो कर्रे वाले पलंगतोड़ आशिक थे । सुशीला, मनु, अलाने की पुतबहू और फलाने की परपोती तो शाम होते ही बापू के बिस्तर पे सजती थी । तब ये भड़का आशिक सलमा को याद कर करके टसुए बहाता है और उन्हीं गान्ही बाबा को गरियाता है जिनकी जय-जयकार कभी मास्टर जी ने बुलवाई थी |
     @#$%* तुमाए चक्कर में हमाये बचपन की मोहब्बत चाँद मियां से ब्याह गयी । हरामखोर हर साल का अलग माँडल निकालता है । हमसे ब्याह पढा होता तो बस दो बच्चे करते । काहे कि बच्चे दो ही अच्छे | ट्रक पे भी लिखा होता है: हम दो हमारे दो | छोरे का नाम खाते चुन्नू और छोरी का मुन्नी । नरक में कुम्भीपाकम् हो इस $%@# गान्ही का । तब हम पढ़े लिखे सो कॉल्ड इंटेलेक्चुअल लोग बोलते हैं कि तुम बहुत बद्तमीज़ हो बापू को गाली लिख रहे हो । और ब्लाह ब्लाह ।
             
     मेरे ख्याल से दिक्कत वहां से शुरू होती है जब हम अपने माइंडसेट दूसरों पर थोपते हैं । अरे वो पढ़ाइये जो सच है । बच्चे बहुत होशियार हैं आजकल । आज नहीं तो कल वो सच्चाई पता कर लेंगे । आज सबके पास इंटररनेट है भाई । आपकी अय्याशी के सबूत यहाँ हाई रेसोलूशन में मौजूद है । बेहतर है आप बच्चो को सब बताइए | किस परिस्तिथि में उन्होंने क्या किया - उन्हें ये सब बताइए | ताकि आगे चलकर वो अपने मन में महापुरुषों के बारे में गलत धारणा न बनायें |
     यहाँ गाँधी जी का सिर्फ उदाहरण लिया गया है । आप अपने आस पास छात्रों के विचार सुनिए | वो हर महापुरुष पर ऊँगली उठा रहे हैं । आप ध्यान से देखिये आजकल हर महापुरुष इसी तरह गाली खा रहा है । और आप इसे गलत भी नहीं कह सकते | हर समाज के घरों में अपनी अपनी तस्वीरें सजी हैं । खाँचे खिंच चुके हैं । लोग बँट रहे हैं । और ये बहुत गलत हो रहा है । आज नहीं तो कल आपको इस पर ध्यान देना ही होगा । बेटर टुडे देन टुमारो ...

पुण्यतिथि पर महात्मा गाँधी जी को सादर नमन _/\_

Saturday, 28 January 2017

जौहर- गाथा

मेरे लिये शब्द सिर्फ शब्द नहीं होते | वो जीवंत परिवेश होते हैं | मैं प्रेमचन्द को पढते वक्त खुद को होरी का भाई पाता हूँ | निर्मला को पढते समय मैने उसे मेरी सखी पाया | उसके हालात पर मेरी आखों में अंगार थे | उसी तरह जब मैं जौहर शब्द सुनता हूँ तो खुद को आग की लपटों में घिरा पाता हूँ | मैं आखेँ मूँद भी लूँ तो भी राजपूतानियों के जलते शरीरों के दृश्य मेरे अंत:करण को बींध देते हैं | कानों को बन्द भी कर लूँ फिर भी उनकी कारूण चीखें मेरे कानों के परदे चीर देती हैं |
बचपन में चाय पर ज़रा सा जल गया था एक बार | घर में कोहराम मच गया था | कोलगेट लगाओ दही लाअो | यह करो तो छाला नहीं पडेगा वह करो तो निशान चला जायेगा | तनिक सोचिये कैसा वीभत्स दृश्य होगा वो जब सैकडों हजारों महिलायें इस्लामी अत्याचारियों से अपनी पवित्र देह बचाने के लिये जौहर में प्रवेश कर रही होंगी | रूह तो काँपी होगी उनकी एक बार | पैरों ने भी साथ नहीं दिया होगा शायद | फिर भी अपनी इज्ज़त की रक्षा के लिये , मुगल शासकों के हरम में रखेल बनने की जगह उन्होने मौत को गले लगाना ऊचित समझा |

दीगर-ए-बात है वो जहर खा के भी जान दे सकतीं थीं | पर उन्होने जौहर चुना | मौत का सबसे कठिन रास्ता | जलती चिता में ज़िन्दा सशरीर प्रवेश | बस रणभूमि से ख़बर आयी राणा के हुतात्मा होने की और इधर पग बढ गये जौहर की तरफ | क्यूँ ? क्युकि मरने के बाद भी इस्लामी दहशदगर्द उसके शरीर की बोटी बोटी नोच लेंगे | सुनी थी पद्मिनी ने राजा दाहिर की दोनों पुत्रियों की कहानियां | किस तरह दरिन्दों ने मृत शरीरों को अपवित्र किया था | यही हाल राणा जी हत्या के बाद उसके शरीर का होना था |

इसीलिये उसने हीरे नहीं चाटे | इसीलिये उसने जहर नहीं खाया | इसीलिये उसने अपनी कटार से अपनी अंतडियाँ नहीं काटी | इसीलिये उसने जलती चिता में प्रवेश किया | ताकि उसका शरीर भस्मीभूत हो जाये | ताकि उसकी देह को विधर्मी स्पर्श भी न कर पायें | वो तो राणा के प्रेम में पगी थी | उसी प्रेम के लिये उसने खुद को कुर्बान कर दिया | राणा ने भी अपनी जान की बाजी लगा उसकी रक्षा की | अपने जीते जी उन्होने वाहशी खिलजी को राजपूतों की इज्ज़त से खेलने नहीं दिया | प्रेम इसे कहते हैं निर्देशक महोदय |
प्रेम 2 आत्माओं का मिलन होता है | अलाउद्दिन खिलजी ने जो किया उसे वासना कहते हैं | और प्रेम में तो वासना का दूर दूर तक स्थान नहीं होता | अलाउद्दिन रानी पद्मिनी के शरीर को पाना चाहता था | उनकी आत्मा को नहीं | इसीलिये इतिहास ने खिलजी को कामी कीडा लिखा और पद्मिनी को आत्मबलिदानी | ये इतिहास का वो न्याय है जो खिलजी और उसके मानस पुत्रों के माथे पर कलंक है | खिलजी के वंशज लाख कोशिश कर लें पर इस कलंक को अपने माथे से वो धो नहीं सकते |
आप पद्मिनी के चरित्र को कलंकित करना चाहते हैं | अल्टरनेट वियू के नाम पर आप राजपूती अस्मिता को तार तार करना चाहते हैं | पर य़ाद रखिये जिसे खिलजी जैसे दुर्दांत हत्यारे नहीं कर पाये उसे आप जैसे तुच्छ फिल्मकार भी नहीं कर सकते | क्युकि सूरज पर थूकने वाले शायद ये भूल जाते जाते हैं कि उनका थूक पलट कर उनके मुंह पर ही गिरता है |

Sunday, 15 January 2017

बिल्लियों के कोसने से कभी उल्काएं नहीं गिरा करतीं

     ढाका की मलमल के बारे में आप सभी ने सुना होगा | कहते हैं कि आप ढाका की मलमल वाली चादर को एक अंगूठी से निकाल सकते थे | इतनी बारीक़ और महीन होती थी ये | यही कहानिया कमोबेश भारत के हर हिस्से की हैं | हमने एसा लोहा बनाया जिसपे हजारों सालों से जंग नहीं लगी | पर ये सब हवा में नहीं हुआ | इसे करने में हमारे पूर्वजों की दिन रात की मेहनत और ज्ञान था |
                                        
     फिर अंग्रेज आये | अपनी रिपोर्ट में वायसराय ने लिखा “ मैं हैरान हूँ भारत को देखकर | यहाँ कोई गरीब नहीं | सब व्यापारी है, किसान हैं | सबके अपने काम धंधे हैं | सबके यहाँ स्वर्ण भंडार हैं | मैं यहाँ इतने दिनों से हूँ | मैंने किसी को भीख मांगते नहीं देखा | सिवाय साधू सन्यासियों के | पर वो समाज के हित में मांगते हैं | अपने लिए नहीं | ये हैरत की बात है ” ये था इंग्लॅण्ड के भारत में तत्कालीन वायसराय के शब्दों में हमारा भारत | नाम नहीं लिख रहा हूँ | गूगल कीजियेगा |

     धन- धान्य और तमाम तरह के खनिजों से परिपूर्ण सोने की चिड़िया कहे जाने वाली इस भारत भूमि को लूटने के नए नए तरीके खोजे जाने लगे | तमाम मीटिंग्स हुई | निष्कर्ष निकाले गए | निर्णय लिए गए | चूंकि तब तक अंग्रेज भारतवर्ष के भाग्य विधाता बन चुके थे सो उनके लिए गए निर्णय भारत का भविष्य थे | उन लिए गए निर्णयों में से एक था भारत के हथकरघा उद्योग को बर्बाद करने का निर्णय | आधुनिकीकरण के नाम पर तमाम छोटी छोटी ग्रामोद्योग इकाइयों को बंद करा दिया गया |
     भारत भर से कपास ढाका की जगह लन्दन जाने लगी | वहां से मशीन का बुना सस्ता और घटिया कपडा आने लगा | चूंकि ये कपडा बहुत ही सस्ता और दिखने में आकर्षक था | सो हमारे भारतीय भाइयों ने इसे हाथों- हाथ लिया | धीरे- धीरे बुनकरों के घर में फांका पड़ना शुरू हुआ | उन्हें दो जून की रोटी भी बमुश्किल नसीब होने लगी | मजबूरन उन्हें अपने पूर्वजों के हुनर, जो पीढ़ी दर पीढ़ी उनके हाथों में रचा बसा था, उसे तिलांजलि देनी पड़ी |
     आप सोच रहे होंगे मैं इसे क्यों सुना रहा हूँ ? बताता हूँ | आज आपको बहुत से तथ्य पता चलेंगे | लेख थोडा लम्बा हो जायेगा अत: आपसे धैर्य से पूरा पढने की गुजारिश कर रहा हूँ |
     अभी हाल ही में मोदी जी खादी ग्रामोद्योग की डायरी और केलेंडर पर सूत कातते नजर आये | ये डायरी और केलेंडर हर साल छपते हैं | इसमें कुछ नया नहीं है | पर इस बार फ्रंट पेज पर गाँधी जी की नहीं बल्कि आज के आइकोन भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर थी | बस यही विवाद की जड़ है | हालाँकि ये प्रथम बार नहीं है जब फ्रंट पेजेस पर गाँधी जी नदारद हैं | विगत वर्षों में कई बार एसा हुआ है | पर चूंकि इस बार केंद्र में मोदी जी हैं तो विवाद उठना लाजमी है |
                               modi with gandhi charkha
     हिम्मत कैसे हुई संघ के एक स्वयंसेवक की गाँधी को रिप्लेस करने की ? माना आपको अपार जनसमर्थन प्राप्त है | पर कुछ मामले ऐसे हैं जहाँ लकीर पीटना अनिवार्य है | कहते भी है “ मजबूरी का नाम महात्मा गाँधी |” और आपने साहब उन्ही गाँधी को रिप्लेस कर दिया | ऐसे में वो लोग जिनकी रोजी रोटी गाँधी नाम से चलती है, भला वो कैसे चुप रह सकते हैं ? माना आपके विचारों से प्रेरित हो आज का युवा खादी खरीदने लगा है | आकंड़ो को अगर देख लें तो खादी की बिक्री के आकंडे की सुई जो विगत बीस वर्षो 5-6 % की बढ़ोतरी पर टिकी हुई थी | आज आपके शासन काल में वही सुई मीटर फाड़ के 34% का ग्रोथ दिखाती है |
     क्या जरूरत है साहब आपको खादी की फिकर करने की ? काहे नहीं उन कुकुरमुत्तों को चैन से उगने और फलने फूलने देते आप ? पड़ा रहने दीजिये चरखे को इक कौने में | लगने दीजिये उसे धूल-धक्कड़ | बाकी नेताओ की तरह आप भी बापू के जन्मदिन पे जाइए आश्रम में | चढ़ा आइये 2 फूल उस चरखे की मैय्यत पर | जब आज तक यही होता आया है तो वही होने दीजिये न | आप काहे चरखे को अपने अंगोछे से पोछ अपने हाथ ख़राब करते हैं ? मरने दीजिये उन बुनकरों के सपनों को, फटने दीजिये उस मलमल की चादर को जो कभी अंगूठी से पार हो जाया करती थी | पहले अंग्रेजों ने उन्हें लूटा, अब चरखे की आड़ में गाँधी के वंशज लूटेंगे | आपको क्या ?
     साहब हम भारतीय इसी लायक हैं | 1200 सालों की गुलामी हमने युही नहीं झेली | आपका विरोध तार्किक आधार पर नहीं है | ये हो भी नहीं सकता | क्युकि गाँधी को बेचने वाले तर्क की कसौटी पर कहीं खरे नहीं उतरते | चूंकि बात अब लेगेसी की हो रही है | तो गाँधी जी की लेगेसी और वर्तमान पर विमर्श करना और उसे आप तक पहुँचाना हमारा परम कर्तव्य है | दो ट्वीट पेशे- खिदमत हैं |

    1. “Since it’s happy women day today. Men should be allowed to touch them to feel happiness.”
    2. “I love to watch women playing at Wimbledon. The trouble is I keep watching the wrong balls.”

मेरे हिंदी पाठकों के लिए मैं हिंदी अनुवाद लिख रहा हूँ |
   1. “चूंकि आज महिला दिवस है इसीलिए आज पुरुषों को उन्हें छूकर खुश होने की स्वतंत्रता होनी चाहिए |”
   2. “मुझे महिलाओं को विम्बलडन में खेलते देखना पसंद है |” माफ़ कीजिये इससे आगे का अनुवाद मैं नहीं लिख सकता | बस इतना समझ लीजिये कि आगे जो कहा गया है वो बहुत ही बदतमीज़ और घटिया मानसिकता को दर्शाता है | एक सभ्य परिवार से आने वाला कभी एसा नहीं कह सकता |
     हाँ ये मेरे ट्वीट नहीं हैं | मैं संघ का स्वयंसेवक हूँ | मुझे शाखाओं में “यत्र नारीयस्तु पूज्यते” का पाठ पढाया गया है | मैं वीर शिवाजी की उस परंपरा का वाहक हूँ जिसने विजित गौहर खान में अपनी माँ का अक्स देख उन्हें ससम्मान पालकी में बैठाकर उनके शिविरों में वापस भेजा था । ये उदगार हैं महान महात्मा गाँधी जी के प्रपोत्र तुषार गाँधी के | जिन्हें आपने कल टीवी पर कलपते देखा होगा | कल उन्होंने कहा कि “बापू अब KVIC को राम-राम कह दें. यूं भी KVIC ने खादी और बापू दोनों की विरासत को कमजोर ही किया है. लिहाजा मोदी को चाहिए कि वो इस कमीशन को निरस्त कर दें |”
                                  

                                  
     इन महानुभाव ने विरासत चुराने की बात की है | मैं यहाँ इन्हें गाँधी जी की सुशीला बेन और मनु बेन को अपने बिस्तर पर सुलाने वाली विरासत से नहीं जोड़ रहा | यद्यपि ऊपर लिखे 2 ट्वीट से ये स्पष्ट है कि ये किस विरासत की बात कर रहे हैं | फिर भी मैं इनका ध्यान कुछ एतिहासिक तथ्यों की तरह खींचना चाहूँगा |
     1. भारत के इतिहास में पूर्ण स्वराज्य की मांग करने वाले वीर सावरकर प्रथम व्यक्ति थे | उन्होंने सन 1900 में पूर्ण राजनैतिक स्वतंत्रता की बात की | उस समय तक कांग्रेस के अधिवेशनों में उनकी अंग्रेजों के प्रति भक्ति प्रकट करने के लिए “लॉन्ग लिव द किंग” गाया जाता था | बाद में वीर सावरकर से प्रभावित हो यही मांग आज़ाद भगत सिंह आदि क्रांतिकारियों ने की | उस समय गाँधी जी की लीडरशिप में कांग्रेस की मांग डोमिनियन स्टेट की थी | यानि कि शासन तो अंग्रेजों का ही हो पर उसमे थोड़ी बहुत सहभागिता भारतियों की हो | जब अंग्रेजों के अत्याचारों के विरूद्ध भारतियों में आक्रोश बढ़ा और अंग्रेजों की सेफ्टी वाल्व कांग्रेस इस आक्रोश को थामने में असफल रही | तब जाकर 1929 में गाँधी जी द्वारा पूर्ण स्वतंत्रता की मांग की गयी | तो क्या ये कहा जा सकता है कि गाँधी जी ने सावरकर जी के विचारों को चोरी किया और अपने नाम से उनका प्रचार किया ?
                               
     2. सर्वप्रथम 1905 में वीर सावरकर ने विदेश निर्मित वस्त्रों की होली जलाई | सर्वप्रथम उन्होंने भारत के हथकरघा उद्योग की बर्बादी को समझा | बुनकर भाइयों के हक़ की आवाज बने | गाँधी जी ने यही काम ठीक 16 साल बाद 1921 में किया | तब जाकर उन्होंने चरखा चलाया | तब उनका चरखा बुनकरों के संघर्ष का प्रतीक बना |
     चरखा चलाने का उद्देश्य बिलकुल स्पष्ट था | अपने हाथ की बुनी खादी पहनों और विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार करो | उन्होंने खुद एक दुशाला एक धोती पहनी | उनका कहना था की अपनी आवश्यकताओं को कम से कम करों | पर आवश्यकताओं की सीमित रखने का संदेश तो स्वामी विवेकानंद ने उनसे दशकों पहले दिया था | “सिम्पल लिविंग एंड हाई थिंकिंग |” अब चूंकि गाँधी जी ने भी बिलकुल यही सन्देश दिया तो क्या यह कहा जायेगा कि गाँधी जी ने स्वामी विवेकानंद जी की विरासत चुरा ली ?
     लेख बहुत लम्बा खिंच चूका है | मैं वापस अपनी प्रस्तावना पर आता हूँ | गाँधी ने अपने लिए चरखा नहीं चलाया | उन्हें भारत के मुख्य आसामी फाइनेंस करते थे | वो चाहते तो आसानी से बढ़िया इंग्लॅण्ड का बुना सूट पहनते और उन्होंने पहना भी | किन्तु गरीब बुनकरों की दुर्दशा देख गाँधी जी ने उनके लिए चरखा उठाया | गाँधी जी का चरखा मुख्यत: अंग्रेजों की उस लूट खसोट वाली औपनिवेशिक नीति के विरुद्ध था जिसके तहत अंगेजों ने भारत को लूट अपना घर भरा | जिसने लाखो बुनकरों से उनके चरखे छीन उन्हें पैसे पैसों का मोहताज कर दिया |
     इस चरखे ने लोगों को प्रेरणा दी अंग्रेजों के खिलाफ उठ खड़ा होने के लिए | उनका चरखा आर्थिक आज़ादी के संघर्ष का प्रतीक था | पिछले 120 सालों के इस संघर्ष को गाँधी की तस्वीर को कौड़ियों के मोल बेचने वाले तुषार गाँधी और उन जैसे लोग नहीं समझ सकते | आज ग्रामोद्योग बढ़ रहा है | ग्रामीण अंचल के युवा उद्योगों के लिए लोन देकर मोदी सरकार गाँधी और दीन दयाल के ग्राम स्वराज्य के सपनो को साकार कर रही है |
     आज ये लोग जो विरोध में हैं वो इसीलिए बौखलाए नहीं हैं कि मोदी की तस्वीर लग गयी | वो इसीलिए बौखला गए हैं कि जिस विरासत को नोच नोच कर उन्होंने आज तक खाया है वो विरासत अब मोदी की हो रही है | अगर यही हाल रहा तो इन विरासतखोरों के लिए खाने के बांदे पड जायेंगे | पर भारत की माटी का एक सपूत अभी जिन्दा है | वो बापू को युही लुटने नहीं देगा | वो चौकीदार अपने डंडे से आपको युही रोकता रहेगा | आप भी अपना कोसने का कीर्तन जारी रखिये | क्युकि बिल्ली के कोसने से कभी उल्काएं नहीं गिरा करतीं |

Saturday, 26 November 2016

नेता जनता संवाद

नेता जी - ऐ सुनो ! 28 तारीख को भारत बंद का आवाहन है । दुकान पर काली मिर्च मत बेचना । खेत में प्याज मत उगाना उस दिन ।
जनता - क्यों करना है भाई ? किस ख़ुशी में भारत बंद है ?
नेता जी - सरकार ने 500 हजार का नोट बंद कर दिया । वो भी बिना हमें बताये । पीएम की तानाशाही नहीं चलने देंगे । 
जनता - वो तो ठीक है पर तुमको क्या दिक्कत है ? तुम्हारी तशरीफ़ में थोड़े न कील ठुकी है ।
नेता जी - देखते नहीं । देश की जनता को कितना प्रॉब्लम हो रहा है ।
जनता - तकलीफ हमें है तो तुम क्यों फ़ोकट के पॉपकॉर्न बन उछाल ले रहे हो ? तुम्हे क्या ? तुम तो फसक्लास गाडी में बैठकर AC के मजे ले रहे हो । तुम्हे क्या दिक्कत ?
नेता जी - शादी भी नहीं हो रही ।
जनता - होगी भी नहीं । करम ही ऐसे हैं तुम्हारे ।
नेता जी - नामुराद हम जनता के हक़ की लड़ाई लड़ रहे हैं ।
जनता - पर पैसा तो तुम्हारा भी काई हुआ है । हमारे लिए काहे लड़ रहे हो भाई ।
नेता जी - हमारे पूर्वजों ने भी तुम्हारी लड़ाई लड़ी थी । दादी भी बोली थीं "गरीबी हटाओ" । अब हम तुम्हारी गरीबी हटाएंगे |
जनता - हटी क्या गरीबी ?
नेता जी - हट जायेगी । हमने एक नया प्लान बनाया है ।
जनता - बाबू बुरा मत मानना पर तुमसे न हो पायेगा । तुम रहन दो । एक काम करो ।
नेता - क्या ?
जनता - ये लो पामरा । पहले हमारे खेत की घास हटा दो ।
नेता - व्हाट इज पामरा , व्हाट इज घास ? एंड आई एम् नॉट हियर टू रिमूव योर घास ।
जनता - नेताजी आपको पामरा घास खुरपी का पता नहीं । आपको गन्ने और गुड़ का अंतर पता नहीं । आपको नोन तेल धनिया का पता नहीं और चले हो आप हमारी लड़ाई लड़ने । क्यू मजाक करते हो साहब । इन 60-70 सालों में यही तो करते आ रहे हो आप और मूर्ख बनते आ रहे हैं हम । आपके दादाजी गाँव गरीब चरखे की बात किया करते थे । आज़ादी के बाद उन्हीं के रंग कितने बदल गए । जब देश के पास अनाज नहीं था खाने को तब उनकी सिगरेट की डिलीवरी हवाई जहाज से हुआ करती थी ।
  आप ही की दादीजी कहा करती थीं न । मुझे पीएम बनाओ और गरीबी हटाओ । बना दिया पीएम । हटी हमारी गरीबी ?किसान थे हम । जमीन थी हमारी । सोने जैसा गेंहू उगाते थे, धान की फसल लहलहाती थी हमारे खेत में । 1951 में 71% किसान था देश में 2011 में 45% रह गए । कहाँ गए 26% किसान ? 1991 में हमारे पास 185 मिलियन हेक्टेयर खेती लायक जमीं थी 2011 में 182 मि.हे. जमीं बची । कहाँ गयी हमारी जमीं ? धरती माँ खा गयी या आसमान ने निगल ली ?
     1951 में 82% लोग गांव में रहते थे 2011 में 68% रह गए । कहाँ गया गाँव का गरीब किसान ? बताइये ? किसान गया शहर आपके घर में झाड़ू बुहारने । वो गया शहर अपने गमछे से आपकी गाड़िया पोछने । वो गया शहर बाबू साहब को दफ्तर में पानी पिलाने । वो गया शहर साहब का कुत्ता टहलाने । अन्नदाता कहते थे लोग हमें और आपने हमें अपने घर का नौकर बना दिया । आपने हमसे हमारी जमीन छीन ली साहब । हमें खेतिहर मजदूर बना दिया ।
व्यापारी थे हम । खुद का कुटीर उद्योग था हमारा । गाँव में अरोमा की खुशबू का साबुन बनाते थे और देश भर बेचते थे । सूत की मखमल बुनते थे यहाँ और इंग्लैंड में बिकता था । क्या किया आपने । लगा लगा के हिटलरी कर उद्योग तबाह कर दिए आपने । छोटे छोटे व्यापारियों से मुँह के निवाले छीन लिए आपने ।
     दिया क्या आपने हमें । चुनावों में झूठे वादे । हकीकत की टूटी फूटी सड़के । लाखों करोड़ के घोटाले । दिल्ली मुम्बई का स्लम उस पर भी समय समय पर बुलडोजर चलवा देते हो आप । आज जब नोटबंदी से आपका काला पैसा पानी हो गया तो गरीब जनता की याद आ गयी साहब को । आज आप गरीब के हक की लड़ाई की बातें करते हो । शर्म नहीं आती आपको । गरीबी हटाने का वादा था आपका साहब । पर आपने तो गरीब ही हटा दिए । आप पर किस विधि विश्वास करें हम ?
     हमारी चिंता करना छोड़ दीजिए । हमने अपना प्रधान सेवक चुन लिया है । भरोसा है हमें उस पर । पांच साल ऊँगली पकड़ चलेंगे हम । जरूरत पड़ी तो कंधे से कन्धा मिला के चलेंगे हम । जैसे कि अभी चल रहे हैं ।
काहे का भारत बंद ? क्यों हो भारत बंद ? ये अब ड्योढ़ी दुगुनी मेहनत करेगा । सतत आगे बढ़ेगा । भारत अब बंद नहीं होगा बल्कि अपने सुनहरे भविष्य के नए द्वार खोलेगा । अब कोई खानदानी, कोई एनार्की या कोई चिटफंड वाली घोटालेबाज़ हमें नहीं रोक सकती । हम जानते हैं ये फैसला देशहित में है । और हम सब एक-जुट होकर इसका समर्थन करेंगे । आपको साथ देना है तो कदम बढाइये हाथ मिलाइये वरना टांग अड़ाने वालों की टांगे कुचल कर हम आगे बढ़ेंगे ।
     अब फटाफट अपनी फॉर्च्यूनर में बैठकर दिल्ली निकल जाइये साहब । इन गांवों की पगडंडियों में चलेंगे तो कमर लचक जायेगी आपकी । और जाकर कह देना अपने आकाओं से कि भरतवंशियों ने साँपो को दूध पिलाना अब बंद कर दिया है । 

Sunday, 9 October 2016

चाइनीज़ झालर


“खील, बताशे, लक्ष्मी मैया का कलेंडर, पूजा का सामान.... ये क्या प्रिया सामान की लिस्ट में तुम्हारी प्रिय चीज नहीं है, जिसे लेकर तुमने पिछली दिवाली पर अपना रौद्र रूप दिखाया था | इस बार अपनी तरह घर नहीं सजाओगी क्या ?” अक्षर ने शीशे के सामने बैठकर इठलाती प्रिया की चुटकी लेते हुए कहा |

प्रिया अक्षर के मन की बात समझ गयी थी | “नहीं अक्षर !” मीठी चाशनी में लिपटे हुए ये प्रिया के ये २ शब्द अक्षर के कानों में मिश्री घोल गए | प्रिया के मुंह से उसका नाम सुनते ही अक्षर के दिल में प्रेम का सितार बजने लगा | वो इस मधुर संगीत के तरन्नुम में डूबने ही वाला था पर प्रिया की मोहक आवाज़ ने उसकी तन्द्रा तोड़ गयी |

“इस बार हम चाइनीज़ झालर से घर नहीं सजायेंगे बल्कि मिट्टी के दिए जलाएंगे | जानते हो हमारे देश के एक बड़े हिस्से पर चीन का अवैध कब्ज़ा है | आये दिन चीनी सैनिक हमारी सीमा पर उत्पात मचातें हैं | पाकिस्तान को भी इसी ने चढ़ा कर रखा है | अब तो इसने ब्रह्मपुत्र नदी का पानी भी रोक दिया | तुम ही बताओ अक्षर ऐसी स्थिति में क्या हम भारतियों चीन में बने उत्पाद खरीदने चाहिए ?”




“वैसे भी मिट्टी के दिए ज्यादा सुन्दर लगते हैं | एक कतार में चुने हुए छोटे-छोटे प्रकाश पुंज | खुद जलकर दुनिया को रौशनी से तरबतर करते ये बित्ते भर के दिए | और तुम जानते हो अक्षर मिट्टी के दीयों का सबसे खूबसूरत फायदा क्या है ?”

ऐसे मौके बहुत कम आते थे जब उसकी प्रिया यूँ दार्शनिक अंदाज़ में बोलती | अक्षर को प्रिया का बडबोलापन बहुत भाता था | इसीलिए आज अक्षर सिर्फ सुनने के मूड में था | प्रिया की आखों में झांककर एक हल्की सी मुस्कान देकर अक्षर बोला “नहीं प्रिया ! मैं नहीं जानता वो खूबसूरत फायदा | तुम बताओ |”

“इन दीयों को बेचकर जो पैसे गरीब कुम्हार कमाएंगे उन्हें वो अपने बच्चों की पढाई-लिखाई और दिवाली के पटाखों पर खर्च कर सकते हैं | इस दिवाली पर सिर्फ दीपक ही क्यों आतिशबाजी छुडाये ? उन गरीब बच्चों को भी तो हक़ है न |”
                     
“उनका भी तो मन करता होगा मुर्गा-छाप पटाखे छुड़ाने का | रॉकेट की तरह सर्र्र से उड़ जाने का | चकई की तरह गोल-गोल घूमने का | फिर हम इस चाइनीज़ झालर को खरीद कर उन नन्हें मुन्नों से उनके सपने क्यों छीने ? हम्म !” 


“तो बताओ प्रिया कितने दिये चाहिए तुम्हें | कितने दीयों से रोशन करोगी अपना आशना |” जबाब में प्रिया मुस्करा भर दी | अक्षर भी इससे आगे कुछ कह न सका | वो  अपलक प्रिया को निहार रहा था | उसकी बडबोली फेसबुकिया प्रिया आज सचमुच की एंजेल प्रिया बन चुकी थी | 

Saturday, 23 July 2016

2 गोली उनके सीने में उतार दूंगा : आज़ाद

नाम: आज़ाद
पिता का नाम : स्वाधीन
घर : जेलखाना
अब लिखने की जरूरत नहीं कि आज़ाद कौन था | ये मात्र तीन पंक्तियाँ किसी भी भारतीय के लिए श्रीमद भागवत के श्लोक के बराबर हैं | पर आज उस महामानव के जन्मदिन पर मैं आपको ये कहानी नहीं सुनाऊंगा | ये तो आप सब ने सुनी है | आज मैं चन्द्र शेखर आज़ाद की वो कहानी सुनाऊंगा जिसे सुनने के बाद आपके रोंगटे खड़े हो जायेगें|
चन्द्रशेखर आज़ाद के माता पिता मध्यप्रदेश के भावरा में एकांत में रहते थे | उस समय तक आज़ाद खुद को देश सेवा के लिए समर्पित कर चुके थे | ये उन दिनों की बात है जब आज़ाद देश में क्रांति की अलख जिन्दा रखने के लिए सरकारी खजाने लूटा करते थे | हजारो का खजाना उनके पास सुरक्षित रहता था | उनके गाँव से एक आदमी उनसे मिलने के लिए आया | बोला कि "इतने पैसे हैं तुम्हारे पास | तिजोरी माल से भरी है | उधर तुम्हारे माता पिता भूख से मर रहे हैं | कम से कम इतना धन तो अपने गाँव पहुंचा दो जिससे तुम्हारे माँ बाप बुढ़ापे में चैन की रोटी खा सके |" जो जबाब आज़ाद ने दिया उसे पढ़ कर मेरे रोंगटे खड़े हो गये | मेरी रूह काँप गयी | आज़ाद ने कहा कि " इस तिजोरी का एक पैसा गाँव नहीं जायेगा | ये पैसा माँ भारती के लिए है | मेरे अकेले के माँ बाप भूखे नहीं सोते | सैकड़ो क्रांतिकारियों के घर में फांके की नौबत है | उनका पालन पोषण गाँव वालों की जिम्मेदारी है | अगर गांववाले उन २ बूढों को २ वक्त की २ रोटियां खिलाने में असमर्थ हैं तो मुझे बता दो मैं गाँव आऊंगा और अपनी पिस्तौल की २ गोलियां उन दोनों के सीने में उतार कर वापस आ जाऊंगा | " ये सुनकर उस आदमी की नजरे झुक गयी | फिर कभी आज़ाद के माँ बाप को भूखा नहीं सोना पड़ा |
ये कहानी मैं आपको इसीलिए नहीं सुना रहा क्युकी आज उन्हीं आज़ाद का जन्मदिन है | ये मैं इसलिए सुना रहा हूँ क्युकि आज मन व्यथित है | आज देश आज़ाद है और आजाद देश की कृतज्ञ सत्ता उस आज़ाद का अपमान करती है इसीलिए आपको मैं ये कहानी सुना रहा हूँ | आपको शायद याद न हो पर मैं भूल नहीं सकता | आज जो दलितों की कथित देवी अपने अपमान से आहत हैं कभी इन्होने ही आज़ाद को आतंकी कहा था | वो आज़ाद जिसने अपने खून से आज़ादी लिखी, जिसने पहाड़ो को अपने नाखूनों से चीरा था | जिसने देश को भगत सिंह राजगुरु और बिस्मिल से अमूल्य रत्न दिए जो अल्फ्रेड पार्क में अकेला बीसिओं से जूझा था | वो फूल जो जमीं पर उगा और फकत आसमान पर खिला | वो आज़ाद हिमालय जिसकी याद में रोया | उस आज़ाद को उप्र की तत्कालीन मुख्यमंत्री 'देवी मायावती' ने आतंकवादी कहा था |
अभी जब 'देवी मायावती' राज्यसभा में खड़े होकर कह रहीं थी कि "मैंने कभी किसी का अपमान नहीं किया" और सभा के अभी सदस्य चुप रहे | कोई ये कहने की हिम्मत नहीं कर सका कि आपने देश के पुत्र चन्द्र शेखर के लिए आतंकवादी शब्द का प्रयोग किया था | जब वो किसी की माँ बहन बेटी का अपमान करती रही और और सब लोग चुप रहे | किसी ने ये कहने का साहस नहीं कि आपका अपमान गलत था पर उसकी आड़ में आपको किसी महिला के सम्मान से खेलने की इजाज़त नहीं दी जा सकती | जब अखिल भारत में कहीं भी विरोध का स्वर नहीं उठा | तब हम दिनकर के वंशजों अपनी कलम उठानी पड़ती है और विरोध में लिखना पड़ता है |
'देवी मायावती' जी आप भले ही उत्तर प्रदेश की चार बार मुख्यंत्री रही हैं पर इससे आपको हमारे आज़ाद को आतंकी कहने का अधिकार नहीं मिल जाता | आज़ाद का नाम इस देश के इतिहास के पन्नो में स्वर्ण अक्षरों में लिखा हुआ है | आपका जिक्र इतिहास के किन पन्नो में होगा या किन अक्षरों में लिखा जायेगा ये मैं यहाँ लिखना नहीं चाहता | चंद्रशेखर आज़ाद को आप जैसे भ्रष्टों के प्रमाण पत्र की जरूरत नहीं है | सूरज के मुंह पर थूकने वाले ये भूल जाते हैं कि उनका थूका हुआ वापस उनके ही मुंह पर आकर गिरता है | इसीलिए 'देवी मायावती' जी कृपया अपने शब्दों के घोड़ो को लगाम दें | अन्यथा देश की जनता आपको और हर उस आदमी को जो देश के हुतात्माओं को आतंकी कहता है जबाब देगी और ऐसा सबक सिखाएगी जिसकी गूँज अनंत काल तक सुनाई देगी |
भारत के महान पुत्र चन्द्रशेखर आज़ाद को उनके जन्मदिन पर नमन _/\_
-अनुज अग्रवाल

Wednesday, 6 July 2016

कहाँ हैं शांतिप्रिय मुस्लिम

अभी पिछले साल ही फिलस्तीन ने इस्रायल के 2 जवान मार दिये थे । बाई गॉड... क्या तांडव किया था बदले में इस्राइल ने | फ़िलिस्तीनियों को उनके ही घर में कुत्तो की तरह दौड़ा दौड़ा कर मारा । हमारे यहाँ के लोगों से इन दोनों ही घटनाओं का कोई मतलब नहीं था । न इस्राइल के सैनिकों की हत्या से और न इस्त्राइल के प्रतिशोध से । पर जब इस्राइल जबाबी कार्यवाही कर रहा था तब कराहे जाने की आवाज़ें भारत से भी आ रहीं थी । दोमुंहे सेक्युलरिस्ट्स दिल्ली में सेव गाजा मार्च निकाल रहे थे । अगर ये मान भी लिया जाए कि ये सब वो इंसान होने के नाते कर रहे थे, तो जब फिलिस्तीन इस्राइल के नागरिकों को मार रहा था तब इनकी मानवीय संवेदनाये कहाँ थी ?
आजकल रमजान का महीना चल रहा है । बांग्लादेश में आतंकियों ने इस्लाम के नाम पर कल 20 लोगों को मार दिया । मारने से पहले पूछा कुरान की आयत सुनाओ । जिसे याद थी वो बचा । जिसे नहीं याद थी उसे कत्ल कर दिया गया । आपको बता दूँ इन मरने वालों में एक भारत की बेटी तारिषि भी शामिल है । अभी तक मुझे तो कोई खबर सुनाई नहीं दी कि किसी ने जंतर मंतर पर इसके विरोध में कैंडल मार्च किया है | यहाँ तक कि निंदा के स्वर तक नहीं सुनाई दिए | आज किसी सेक्युलरिस्ट्स या किसी महिला आयोग गिरोह की कोई मानवीय संवेदना नहीं जगी । क्या मैं पूछ सकता हूँ क्यों ? आखिर ये दोगलापन क्यों ? गाजा पर विधवा विलाप और बांग्लादेश पर ख़ामोशी क्यों ?
और खबरदार जो आपने इसे धर्म के नाम पर हत्या कहा तो । खबरदार इस लोहमर्षक हत्याकांड की निंदा भी आपने गर की तो । आपको तुरंत सांप्रदायिक ठहरा दिया जायेगा । कहा जायेगा कि "आपको तो हर दुर्घटना को मजहब के चश्मे से देखने की आदत हो गयी है | आतंकियों का भी भला कोई मजहब होता है ? कुछ बुरे लोगों के कर्मों की वजह से आप पुरे मजहब को बदनाम क्यों करते हैं और ब्लाह ब्लाह ब्लाह |" पर कोई ये नहीं बताएगा कि उन चंद खूनी भेडियों का विरोध कथित अधिसंख्य शांतिप्रिय मुस्लिम सडको पर करते क्यों नहीं नजर आते ? मुंबई में जब शहीद स्मारक को तोडा जाता है, तब इसका विरोध करते कथित शांतिप्रिय मुस्लिम लोग क्यों नहीं नजर आते ? क्यों शहीद तंजील अहमद के जनाजे से ज्यादा भीड़ हमें आतंकी अफजल और आतंकी याकूब के जनाजे में नजर आती है ? इस्लाम को शांति का मजहब घोषित करने वाले इन प्रश्नों का जबाब क्यों नहीं देते ?
कोई यदि आपको बदनाम कर रहा है तो आपकी छवि को सुधारने का काम भला किसका है ? जिस शक्ति से आप उन लोगों का विरोध करते हैं जो आपके मजहब को आपके अनुसार बदनाम करते हैं | ठीक उसी निष्ठा से आप इन मुस्लिम आतंकियों का विरोध क्यों नहीं करते, जिनकी वजह से आपका मजहब बदनाम होता है ? क्यों नहीं आप याकूब को अपने यहाँ दफनाने से मना कर देते ? क्यों नहीं आप आइसिस में जाने वाले लड़ाकों के परिवारों का सामाजिक बहिष्कार करते ? आप हर बार क्यों आतंकियों के पक्ष में खड़े नज़र आते हैं ? यदि आप आगे आकर इनका विरोध करें तो किसी कि क्या मजाल जो आपके मजहब को आतंकी कह जाए |
खैर मुझे क्या ? ये आप लोगों का मसला है | आप जानों | और मैं क्यों तारिषि के बारे में लिखूं ? ये सब कह मैं क्यों बुरा बनूँ । क्यों मैं अपना समय ख़राब करूँ ? वो मेरी भला क्या लगती थी | कोई मुझ पर थोड़े न कोई हमला हुआ है | मुझसे थोड़े न कोई आयत पूछी गयी है | फ्राइडे पर डोमिनोज में 50% और सन्डे को मैक डी में 6% डिस्काउंट मिलता है | मैं तो चला बर्गर खाने | तुम मरो सालों ... मुझे क्या !

-अनुज अग्रवाल